राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट ने उत्तराखंड के स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रगति को नई पहचान दी है। मातृ स्वास्थ्य, नवजात शिशु देखभाल, टीकाकरण, पोषण और गैर-संचारी रोगों के नियंत्रण जैसे कई महत्वपूर्ण मानकों पर राज्य ने उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। पहाड़ी और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में आया यह सुधार राज्य सरकार की योजनाओं, स्वास्थ्य विभाग की रणनीतियों तथा जमीनी स्तर पर कार्यरत आशा, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य कर्मियों के समर्पित प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में उत्तराखंड ने प्रभावशाली उपलब्धियां हासिल की हैं। गर्भावस्था की पहली तिमाही में पंजीकरण कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 68.8 से बढ़कर 80.6 हो गया है। वहीं प्रसव पूर्व जांच (ANC) कवरेज में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो 91.8 प्रतिशत से बढ़कर 98.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह संकेत है कि गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हुई है।
संस्थागत प्रसव के मामलों में भी राज्य ने सकारात्मक प्रगति की है। अस्पतालों में होने वाले प्रसव 83.2 प्रतिशत से बढ़कर 88.9 प्रतिशत हो गए हैं, जबकि प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की निगरानी में होने वाले प्रसव 83.7 प्रतिशत से बढ़कर 90.3 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। प्रसव के दो दिनों के भीतर माताओं को मिलने वाली प्रसवोत्तर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी 78 प्रतिशत से बढ़कर 86.5 प्रतिशत दर्ज की गई है।
रिपोर्ट में बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े संकेतकों में भी सुधार की तस्वीर सामने आई है। पूर्ण टीकाकरण का दायरा बढ़ा है और नवजात शिशुओं की देखभाल से संबंधित सेवाओं की पहुंच मजबूत हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मिशन इंद्रधनुष, पोषण अभियान और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
राज्य सरकार ने इस उपलब्धि को स्वास्थ्य क्षेत्र में किए जा रहे निरंतर निवेश और बेहतर निगरानी व्यवस्था का परिणाम बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही गति बनी रही तो उत्तराखंड आने वाले वर्षों में देश के अग्रणी स्वास्थ्य प्रदर्शन वाले राज्यों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

