India Maldives : भारत और मालदीव के रिश्ते फिर पटरी पर - Daily Lok Manch PM Modi USA Visit New York Yoga Day
July 3, 2026
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India Maldives : भारत और मालदीव के रिश्ते फिर पटरी पर

भारत और मालदीव के बीच हालिया महीनों में पैदा हुए तनाव को पीछे छोड़ते हुए दोनों देशों के संबंधों में अब एक नई गर्माहट आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय (25,26 जुलाई) मालदीव यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम देने का काम किया। मालदीव की राजधानी माले पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु ने पारंपरिक रीति-रिवाज़ों और राजकीय सम्मान के साथ भव्य स्वागत किया। यह यात्रा विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि राष्ट्रपति मुइज्जु के सत्ता में आने के बाद भारत और मालदीव के रिश्तों में ठंडापन आ गया था। चुनावी प्रचार के दौरान मुइज्जु की ‘इंडिया आउट’ नीति और भारतीय सेना की उपस्थिति को लेकर किए गए बयान तनाव का कारण बने थे। अब मालदीव भारत के साथ अपने रिश्तों को पुनः सशक्त और संतुलित बनाना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मुइज्जु के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें समुद्री सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, व्यापार, पर्यटन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र शामिल रहे। दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई। मालदीव ने भारत की ‘पड़ोसी प्रथम नीति’ की सराहना की और दोनों देशों ने संयुक्त रूप से यह संदेश दिया कि क्षेत्रीय सहयोग ही एशिया-प्रशांत क्षेत्र की प्रगति की कुंजी है। यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने मालदीव के छात्रों और भारतीय समुदाय को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा, भारत और मालदीव केवल भौगोलिक पड़ोसी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से भी जुड़े हैं। उन्होंने द्वीपीय देशों के लिए भारत की मदद की प्रतिबद्धता को दोहराया और नई योजनाओं की घोषणा भी की जिनमें इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, जल आपूर्ति और डिजिटल सहयोग प्रमुख हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा चीन के बढ़ते प्रभाव की पृष्ठभूमि में भी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। मालदीव की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए भारत वहां स्थायित्व और मित्रता बनाए रखने को लेकर सजग है। प्रधानमंत्री मोदी का दौरा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत द्विपक्षीय संबंधों को केवल आर्थिक या राजनीतिक सीमाओं में नहीं देखता, बल्कि उसे दीर्घकालिक साझेदारी के रूप में मानता है। राष्ट्रपति मुइज्जु द्वारा प्रधानमंत्री मोदी का जिस सद्भाव और भव्यता से स्वागत किया गया, वह इस बात का संकेत है कि अतीत की कड़वाहट को भुलाकर दोनों देश एक नई शुरुआत के लिए तैयार हैं। दोनों देशों के बीच अब एक बार फिर आशा, सहयोग और भरोसे की बुनियाद पर रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी की मालदीव यात्रा न केवल कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही, बल्कि उसने यह भी सिद्ध किया कि संवाद और सहयोग से किसी भी तनाव को खत्म किया जा सकता है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत और मालदीव का एक साथ आना न केवल क्षेत्रीय, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी शुभ संकेत है। पीएम मोदी और राष्ट्रपति मुइज्जू के बीच कर्ज, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, मत्स्य पालन और वॉटर कृषि, डिजिटल परिवर्तन, फार्माकॉपिया और यूपीआई समेत कुल 8 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। पीएम मोदी और मुइज्जू ने माले में रक्षा मंत्रालय के नए भवन का उद्घाटन भी किया। भारतीय पीएम ने मालदीव को ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत एक पौधा गिफ्ट किया।




बीते कुछ सालों में भारत-मालदीव के रिश्ते उतार चढ़ाव भरे रहे–


बीते कुछ सालों में भारत-मालदीव के रिश्ते उतार चढ़ाव भरे रहे हैं। 2023 में मुइज्जू ने ‘इंडिया आउट’ नारे के साथ चुनाव जीता था, लेकिन दिसंबर 2023 में दुबई में यूएन कॉप-28 सम्मेलन में पीएम मोदी और मुइज्जू की मुलाकात ने रिश्तों में सुधार की शुरुआत की। दोनों नेताओं ने आर्थिक साझेदारी और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई। हालांकि, 2024 की शुरुआत में मालदीव के कुछ मंत्रियों की पीएम मोदी और लक्षद्वीप यात्रा के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों के बाद भारत में ‘बायकॉट मालदीव’ कैंपेन शुरू हुआ। जनवरी 2024 में मुइज्जू ने चीन यात्रा के बाद कहा कि मालदीव एक छोटा देश हो सकता है, लेकिन कोई इसे “धमका” नहीं सकता। उन्होंने मई 2024 तक भारतीय सैन्य कर्मियों को हटाने की मांग की थी, जिसके बाद भारत ने सैनिकों को हटाकर उनकी जगह तकनीकी कर्मचारी भेजे।भारत और मालदीव के साझेदारी कई मायनों में अहम है। खासकर जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से दुनिया के तटीय देशों के डूबने का खतरा बढ़ रहा है। इसी संकट का सामना मालदीव को भी करना पड़ रहा है। वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर ग्लोबल वार्मिंग ऐसे ही चलती रही, तो 2050 तक मालदीव का 80% हिस्सा रहने लायक नहीं बचेगा, और 2100 तक ये पूरा देश समुद्र में समा सकता है।





मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी मुख्य अतिथि बने–




मालदीव ने शनिवार, 26 जुलाई को पूरे राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक उत्साह के साथ अपना 60वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। इस ऐतिहासिक मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते द्विपक्षीय रिश्तों और कूटनीतिक मेलजोल का स्पष्ट संकेत है। राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु ने माले के प्रतिष्ठित स्वतंत्रता चौक पर प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। मंच पर दोनों राष्ट्राध्यक्षों ने एक साथ मालदीव के राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी, जो एकता और सहयोग की प्रतीकात्मक झलक बन गई। इस आयोजन में मालदीव की सेना, पुलिस, स्कूली बच्चों और सांस्कृतिक दलों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। अपने विशेष संबोधन में प्रधानमंत्री 60 साल पहले मालदीव ने स्वतंत्रता की जो लौ जलाई थी, आज वह लोकतंत्र और विकास के प्रकाश में बदल चुकी है। भारत, अपनी ‘पड़ोस प्रथम’ नीति के तहत, मालदीव को न केवल निकटतम पड़ोसी, बल्कि घनिष्ठ मित्र मानता है। प्रधानमंत्री ने द्विपक्षीय सहयोग, आपसी विश्वास और साझा समुद्री सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा कि भारत सदैव मालदीव की संप्रभुता, प्रगति और आत्मनिर्भरता के लिए सहयोगी बना रहेगा। कार्यक्रम में पीएम मोदी की मौजूदगी एक राजनयिक संदेश भी है, खासकर ऐसे समय में जब भारत और मालदीव के रिश्तों में हाल के महीनों में खटास देखी गई थी। लेकिन इस आमंत्रण और समारोह ने संकेत दिया है कि दोनों देशों ने बीते मतभेदों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का निर्णय ले लिया है। इस यात्रा के दौरान कई अहम द्विपक्षीय समझौतों पर बातचीत हुई, जिनमें सांस्कृतिक आदान-प्रदान, स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग, द्वीपीय विकास, रक्षा साझेदारी और पर्यटन को लेकर विशेष जोर दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी की इस उपस्थिति को मालदीव ने “गौरवपूर्ण ऐतिहासिक क्षण” बताया।1887 से लेकर 1965 तक मालदीव की विदेश नीति और रक्षा ब्रिटिश कंट्रोल में थी। 26 जुलाई 1965 को उसे पूर्ण स्वतंत्रता मिली। भारत सबसे पहला देश था जिसने मालदीव को मान्यता दी थी।





चीन को ध्यान में रखते हुए भारत के लिए मालदीव हमेशा महत्वपूर्ण रहा–



स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति न केवल मालदीव की जनता के लिए गौरव का विषय बनी, बल्कि इसने एक गहरा राजनयिक संदेश भी प्रसारित किया । विशेषकर चीन को, जो मालदीव सहित भारत के कई पड़ोसियों में अपनी पकड़ मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रहा है। भारत के लिए मालदीव का महत्व केवल उसकी भौगोलिक निकटता तक सीमित नहीं है। यह द्वीपीय देश हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित है और एशिया-यूरोप के बीच के सबसे व्यस्ततम समुद्री मार्गों के पास स्थित है। भारत के लगभग 80% ऊर्जा आयात इन्हीं समुद्री मार्गों से होकर आते हैं। ऐसे में मालदीव में राजनीतिक स्थिरता और भारत समर्थक सरकार का बने रहना भारत की समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा रणनीति के लिए अत्यंत आवश्यक है। दूसरी ओर, चीन ने पिछले कुछ वर्षों में मालदीव में बंदरगाह, सड़क और बुनियादी ढांचे के नाम पर अपने प्रभाव का जाल फैलाने की कोशिश की है। बीआरआई के तहत भारी कर्ज देकर वह कई छोटे देशों को आर्थिक रूप से नियंत्रित करने की रणनीति अपना रहा है । जिसे रणनीतिक रूप से कहा जाता है। भारत इस रणनीति को लेकर सजग है और उसने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि वह अपने पड़ोसी देशों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए स्थायी और पारदर्शी विकास का समर्थन करता है। प्रधानमंत्री मोदी की मालदीव यात्रा इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह ऐसे समय पर हुई है जब दोनों देशों के रिश्तों में पिछले एक वर्ष के दौरान खटास देखी गई थी। राष्ट्रपति मुइज्जु द्वारा भारत से सैन्य सहयोग में कटौती की मांग, और चीन के साथ बढ़ती नजदीकियों को लेकर नई दिल्ली में चिंता व्याप्त थी। लेकिन स्वतंत्रता दिवस समारोह में मोदी की उपस्थिति और दोनों नेताओं की बैठकों में हुई सौहार्द्रपूर्ण चर्चा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत और मालदीव दोनों एक-दूसरे की जरूरत और अहमियत को भलीभांति समझते हैं।
यह यात्रा भारत की ‘पड़ोस प्रथम’ नीति को भी दृढ़ता से दोहराती है जिसमें भारत यह मानता है कि उसका विकास और सुरक्षा अपने पड़ोसियों के साथ मजबूत संबंधों पर आधारित है। मालदीव में स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, और रक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत का योगदान उल्लेखनीय रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा में कई नए समझौते और सहयोग प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई, जो द्विपक्षीय संबंधों को और सुदृढ़ करेंगे। भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक अवसर नहीं था, बल्कि यह एक रणनीतिक निवेश भी है यह सुनिश्चित करने के लिए कि हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलन बना रहे, चीन का एकाधिकार न हो, और भारत के पड़ोसी भारत के साथ अपने भविष्य को अधिक सुरक्षित समझें। प्रधानमंत्री मोदी की यह उपस्थिति चीन के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अपने पड़ोस को लेकर सजग, सक्रिय और प्रतिबद्ध है। इस ऐतिहासिक यात्रा ने यह प्रमाणित किया कि राजनीति में स्थायी दुश्मन नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं, और जब बात क्षेत्रीय शांति, समुद्री सुरक्षा और एशियाई नेतृत्व की हो, तो भारत और मालदीव जैसे देश सहयोग और विश्वास के साथ ही आगे बढ़ सकते हैं।

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