सुख-समृद्धि के साथ अंधकार पर विजय का प्रतीक है दीपावली, कई देवताओं की आस्था से जुड़ा है यह पर्व - Daily Lok Manch PM Modi USA Visit New York Yoga Day
July 27, 2026
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सुख-समृद्धि के साथ अंधकार पर विजय का प्रतीक है दीपावली, कई देवताओं की आस्था से जुड़ा है यह पर्व

आज हमारे देश में दीपावली का पावन पर्व धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। देशवासी सुबह से ही सोशल मीडिया के माध्यम से अपने सगे संबंधियों और मित्रों को शुभकामनाएं बधाई का संदेश देने में जुटे हुए हैं। आज दीपावली सुख समृद्धि और खुशहाली का भी पर्व माना जाता है। यह रोशनी का त्योहार अमावस्या के दिन मनाया जाता है। आज महालक्ष्मी पूजन के साथ और दीपावली पर्व मनाया जा रहा है। यह पावन पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। सनातन धर्म मे दीपावली का विशेष महत्व है। दीपावली को पर्वों की माला भी कहा जाता है। यह पर्व केवल छोटी दीपावली और दीपावली तक सीमित नहीं रहता बल्कि भैया दूज तक चलता है। दीपावली पर दीपक पूजन करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इस दिन लक्ष्मी पूजा से पहले कलश, भगवान गणेश, विष्णु, इंद्र, कुबेर और देवी सरस्वती की पूजा की परंपरा है। ज्योतिषियों का कहना है कि इस बार दिवाली पर तुला राशि में चार ग्रहों के आ जाने से चतुर्ग्रही योग बन रहा है। इस दिन की गई पूजा का शुभ फल जल्दी ही मिलेगा। इस पर्व पर पीपल के पेड़ पर जल जरूर चढ़ाएं। इसके साथ ही देर रात पीपल पेड़ के नीचे तेल का दीपक जलाकर बिना पीछे देखें चुपचाप घर लौट आएं। मान्यता है कि इससे कुंडली में शनि व कालसर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है। पुराण के मुताबिक समुद्र मंथन से कार्तिक महीने की अमावस्या पर लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं। वहीं, वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि इस दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का विवाह हुआ था। इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजा की परंपरा है। स्कंद और पद्म पुराण का कहना है कि इस दिन दीप दान करना चाहिए, इससे पाप खत्म हो जाते हैं। आइए जानते हैं दीपावली क्यों मनाई जाती है।

रामायण और महाभारत में दीपावली पर्व का मिलता है उल्लेख—

पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करने के बाद अपनी जन्मभूमि अयोध्या वापस लौटे थे। जिसके उपलक्ष्य में हर साल कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को दीपावली का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन पूरी अयोध्या नगरी को दीप के प्रकाश से दुल्हन की तरह सजाया जाता है, कलाकृतियों और रंग रोगन से रामजी की नगरी को सजाया जाता है। वहीं धार्मिक ग्रंथो की मानें तो इस दिन समुद्र मंथन से धन की देवी मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। ऐसे ही दीपावली मनाने की परंपरा महाभारत काल से भी जुड़ी है। हिंदू महाग्रंथ महाभारत के अनुसार इसी कार्तिक मास की अमावस्या को पांडव तेरह वर्ष का वनवास पूर्ण कर वापस लौटे थे। कौरवों ने शतरंज के खेल में शकुनी मामा के चाल की मदद से पांडवों का सबकुछ जीत लिया था। इसके साथ ही पांडवों को राज्य छोड़कर वापस जाना पड़ा था। इसी कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को वह वापस लौटे थे। पांडवों के वापस लौटने की खुशी में लोगों ने दीप जलाकर खुशी मनाई थी। इसके बाद प्रत्येक वर्ष दीपावली का पावन पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता यह भी चली आ रही है कि नरकासुर नामक दैत्य ने अपने आतंक से तीनों लोको में हाहाकार मचा दिया था और सभी देवी देवता व ऋषि मुनि उसके अत्याचार से परेशान हो गए थे। तब श्रीकृष्ण जी ने पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बनाकर उसका वध किया था, क्योंकि उसे वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु किसी महिला के हाथों ही होगी। उसका वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने 16000 महिलाओं को मुक्त कराया था तथा समाज में सम्मान दिलाने के लिए उनसे विवाह किया था। इस जीत की खुशी को दो दिन तक मनाया गया था। जिसे नरक चतुर्दशी यानि छोटी दीपावली और दीपावली के रूप में मनाया जाता है।

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