उत्तराखंड की पहाड़ियों में विकास की सुरंगें एक बार फिर मजदूरों के लिए मौत का रास्ता बन गई हैं। चमोली के पीपलकोटी में निर्माणाधीन सुरंग में अचानक पानी और मलबा घुसने से आठ मजदूरों की जान जा चुकी है, जबकि दो अब भी लापता हैं। हादसे ने उत्तराखंड को कुछ वर्ष पहले हुए सिलक्यारा सुरंग हादसे की भयावह याद फिर दिला दी है। उस समय भी सुरंग के भीतर फंसे मजदूरों को निकालने के लिए देशभर की नजरें उत्तरकाशी पर टिक गई थीं। पीपलकोटी की घटना में भी बचाव दल लगातार जिंदगी की तलाश में जुटे हैं। सुरंग के भीतर पानी का रिसाव और मलबे का दलदल रेस्क्यू अभियान की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। हादसे के बाद प्रशासन से लेकर आपदा प्रबंधन और परियोजना से जुड़ी टीमें लगातार मोर्चे पर हैं। अब हर कोशिश उन दो मजदूरों तक पहुंचने की है, जिनका अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है।
13 अगस्त की शाम करीब पौने सात बजे चमोली जिले के पीपलकोटी क्षेत्र में विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में अचानक पानी और मलबा घुस आया। उस समय सुरंग के भीतर 22 मजदूर काम कर रहे थे। देखते ही देखते पानी और मलबे ने रास्ता रोक दिया और मजदूर सुरंग के भीतर फंस गए। सूचना मिलते ही प्रशासन, बचाव दल और परियोजना से जुड़ी टीमें मौके पर पहुंचीं और राहत-बचाव अभियान शुरू किया गया।
शुरुआत से ही सबसे बड़ी चुनौती सुरंग में लगातार रिसता पानी और उसके साथ जमा होता मलबा रहा। अब तक 12 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। इनमें आठ मजदूरों की मौत हो चुकी है, जबकि 14 घायल मजदूरों के बारे में भी उपचार संबंधी जानकारी सामने आई है। ताजा घटनाक्रम में हादसे के करीब 42 घंटे बाद सुरंग से आठवां शव बरामद किया गया। आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने इसकी पुष्टि की है। बरामद शव की पहचान छत्तीसगढ़ निवासी देवनाथ के रूप में हुई है। शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय गोपेश्वर भेज दिया गया है।
पानी और मलबे के बीच जिंदगी की तलाश, दो मजदूरों को खोजने में जुटी टीमें
हादसे के बाद से सुरंग के भीतर फंसे मजदूरों को निकालने का अभियान लगातार जारी है। बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि पानी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। पानी निकालने के लिए सात डिवाटरिंग पंप लगातार चलाए जा रहे हैं, लेकिन रिसाव जारी रहने के कारण चुनौती बनी हुई है। पानी के साथ सुरंग में आया मलबा कई स्थानों पर दलदल में बदल गया है। ऐसे में बचाव दलों को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।
मसलन, पहले पानी का स्तर कम करना जरूरी है, लेकिन पानी कम होने के बाद भी रास्ता तुरंत साफ नहीं होगा। उसके बाद मलबा हटाकर सुरक्षित रास्ता बनाना होगा और तभी लापता मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश आगे बढ़ सकेगी। यही वजह है कि रेस्क्यू अभियान बेहद सावधानी के साथ चलाया जा रहा है।
सुरंग के भीतर की स्थिति लगातार निगरानी में रखी जा रही है। बचाव दल पानी निकालने के साथ-साथ मलबे को हटाने और अंदर जाने के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करने में जुटे हैं। दो मजदूरों की तलाश अब अभियान का सबसे अहम हिस्सा बन गई है।
आठ मजदूरों की मौत से पसरा मातम, अस्पतालों में घायलों का उपचार जारी
हादसे में जान गंवाने वाले मजदूरों में टिहरी जिले के गेंवाल निवासी प्रदीप सिंह पवार, चमोली के मुकेश, बिहार के दुर्लभ शर्मा, झारखंड के विजय और जितेंद्र कुमार शामिल हैं। इसके अलावा लोकेश्वर और भुनेश्वर की जानकारी भी मृतकों में सामने आई है, जबकि उनकी पहचान से संबंधित विवरण जुटाया जा रहा था। अब छत्तीसगढ़ निवासी देवनाथ का शव भी बरामद होने के बाद मृतकों की संख्या आठ हो गई है।
हादसे में घायल मजदूरों को बाहर निकालकर उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। घायलों में छत्तीसगढ़ के कोंडागांव निवासी सुनील दीवान और पेन सिंह, झारखंड के हाबिल गुड़िया, निस्तार भिंगरा, विनोद सावना, दीना बैगरा और खेला राम बिसरा, पंजाब के छब्बा सिंह, हिमाचल प्रदेश के तिलक राज, बिहार के चंदन कुमार, अवधेश, नंदलाल और रोहित पांडे तथा गोविंद शामिल हैं।
घायल गोविंद को उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है, जबकि रोहित पांडे की हालत को देखते हुए उन्हें श्रीनगर रेफर किया गया है। अन्य घायल मजदूरों का इलाज गोपेश्वर जिला अस्पताल में चल रहा है। अस्पताल में भर्ती मजदूरों के परिजन भी लगातार उनकी स्थिति की जानकारी लेने में जुटे हैं। जिन परिवारों ने अपने लोगों को खो दिया है, उनके लिए यह हादसा कभी न भरने वाला घाव बन गया है।
एनडीआरएफ से एसडीआरएफ तक पूरा तंत्र सुरंग में, दो शिफ्टों में चल रहा बचाव अभियान
रेस्क्यू अभियान में टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, एचसीसी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सीआईएसएफ और जिला प्रशासन की टीमें जुटी हैं। बचाव दल दो शिफ्टों में लगातार काम कर रहे हैं। सुरंग के भीतर परिस्थितियां कठिन होने के बावजूद अभियान को रोका नहीं गया है।
पानी निकालने के लिए पंप लगाए गए हैं और मलबे को हटाने का काम लगातार किया जा रहा है। सबसे ज्यादा ध्यान उन दो मजदूरों को खोजने पर है, जिनका अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। लगातार पानी रिसने के कारण बचाव दलों को बेहद सतर्कता के साथ आगे बढ़ना पड़ रहा है।
घटनास्थल पहुंचे मुख्यमंत्री धामी, बचाव अभियान की खुद ली जानकारी
शुक्रवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद घटनास्थल पर पहुंचे और राहत एवं बचाव कार्यों का जायजा लिया। मुख्यमंत्री ने बचाव दलों से अभियान की जानकारी ली और सुरंग के भीतर की स्थिति को समझा। इसके बाद उन्होंने अस्पताल पहुंचकर घायल मजदूरों का हाल जाना और उनके इलाज की जानकारी ली।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को राहत-बचाव कार्यों में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने हादसे की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश भी दिए हैं। साथ ही मृतकों के आश्रितों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। सरकार की ओर से कहा गया है कि हादसे की परिस्थितियों और इसके कारणों की विस्तृत जांच की जाएगी।
फिलहाल प्राथमिकता सुरंग में फंसे दोनों लापता मजदूरों तक पहुंचना और उन्हें सुरक्षित बाहर निकालना है। प्रशासन और बचाव एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
ग्राउटिंग के दौरान अचानक घुसा पानी और मलबा, जांच में सामने आएगा हादसे का कारण
बताया गया है कि हादसे के समय सुरंग में कैविटी की पैकिंग के बाद ग्राउटिंग का काम चल रहा था। इसी दौरान अचानक पानी और मलबा सुरंग में घुस आया। पानी का तेज बहाव और मलबा आने के कारण श्रमिकों को संभलने का मौका नहीं मिला और वे सुरंग के भीतर फंस गए।
हादसे की वास्तविक वजह क्या रही, इसका पता विस्तृत जांच के बाद ही चल पाएगा। फिलहाल बचाव अभियान को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि इस घटना ने सुरंग निर्माण के दौरान सुरक्षा इंतजामों, जोखिम आकलन और आपातकालीन तैयारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिलक्यारा की याद फिर ताजा, पहाड़ के भीतर सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
पीपलकोटी की यह घटना उत्तराखंड में सुरंग निर्माण और बड़े जलविद्युत प्रोजेक्टों के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है। उत्तराखंड पहले भी ऐसे हादसों का दर्द झेल चुका है। 2023 में उत्तरकाशी के सिलक्यारा सुरंग हादसे में निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा धंसने के बाद 41 मजदूर कई दिनों तक भीतर फंसे रहे थे। लंबी जद्दोजहद के बाद उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया था।
उस घटना ने देश को यह सोचने पर मजबूर किया था कि पहाड़ों के भीतर बड़े निर्माण कार्यों में आपदा की स्थिति से निपटने की तैयारी कितनी पुख्ता है। पीपलकोटी की घटना ने उस चिंता को फिर सामने ला दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार पानी और मलबे ने मजदूरों की जिंदगी को अपनी चपेट में लिया है।
हर गुजरते घंटे के साथ बढ़ रही चिंता, दो परिवारों की उम्मीदें सुरंग के मुहाने पर
हादसे के कारणों की विस्तृत जांच आगे होगी, लेकिन फिलहाल सुरंग के भीतर हर मिनट महत्वपूर्ण है। बचाव दल पानी कम करने, मलबा हटाने और सुरक्षित रास्ता बनाने में जुटे हैं। दो मजदूर अभी भी लापता हैं। उनके परिवारों की निगाहें सुरंग के मुहाने पर लगी हैं और हर गुजरते घंटे के साथ उम्मीद और चिंता दोनों बढ़ रही हैं।
रेस्क्यू टीमों के लिए यह सिर्फ एक बचाव अभियान नहीं, बल्कि दो जिंदगियों तक पहुंचने की दौड़ है। सुरंग के भीतर पानी और दलदल जितनी बड़ी चुनौती हैं, उससे कहीं बड़ी चुनौती समय की है। इसलिए अब पूरा ध्यान इसी पर है कि किसी भी तरह दोनों लापता मजदूरों का पता लगाया जाए और उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।

