September 7, 2026
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राष्ट्रीय

नफरत नहीं, शुद्ध सात्विक प्रेम ही संघ के काम का आधार : मोहन भागवत






राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ की गतिविधियों को लेकर लगाए जाने वाले नफरत के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संगठन के काम का आधार गहरी नफरत नहीं, बल्कि शुद्ध सात्विक प्रेम है। उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे होने के बाद भी यह भावना कमजोर नहीं हुई है। स्वयंसेवकों के व्यवहार और संगठन के वातावरण में आज भी इसी शुद्ध सात्विक प्रेम और अपनत्व की भावना को महसूस किया जा सकता है।

लंदन में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में मोहन भागवत ने हिंदू विचार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टिकोण को समझाते हुए कहा कि अपनापन, एकता और जुड़ाव की भावना इसके केंद्र में है। उनके अनुसार, यह भावना केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवार से शुरू होकर समुदाय, समाज और पूरी मानवता तक फैलती है।

भागवत ने कहा कि हिंदू सोच में व्यक्ति को अकेले एक इकाई के रूप में नहीं देखा जाता। व्यक्ति अपने परिवार, समुदाय, समाज और व्यापक मानवता से जुड़ा हुआ है। इसलिए अपनेपन का दायरा लगातार विस्तृत होता जाता है। उन्होंने कहा कि यही भावना लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने और समाज में सहयोग तथा समरसता का वातावरण बनाने का आधार बनती है।

उन्होंने प्रकृति के साथ हिंदू सभ्यता के संबंध का भी उल्लेख किया। भागवत ने कहा कि हिंदू प्रकृति से प्रेम करते हैं। प्रकृति के प्रति यह संबंध केवल उसकी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव भी इसमें शामिल है। उनके अनुसार, भारतीय परंपरा में मनुष्य और प्रकृति को अलग-अलग नहीं माना गया, बल्कि दोनों के बीच गहरे संबंध को स्वीकार किया गया है।

दुनियाभर में जारी संघर्षों, पर्यावरण संबंधी संकट, आर्थिक चुनौतियों और डिजिटल युग के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदू सभ्यता दुनिया को क्या दे सकती है, इस सवाल पर भागवत ने भारतीय दर्शन की एकता की अवधारणा को सामने रखा। उन्होंने कहा कि दुनिया में दिखाई देने वाली विविधता के पीछे मूल रूप से अस्तित्व एक ही है।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग व्यक्ति, समाज, संस्कृतियां और जीवन पद्धतियां दिखाई दे सकती हैं, लेकिन इनके बीच एक गहरा जुड़ाव मौजूद है। हिंदू चिंतन इसी व्यापक एकता को स्वीकार करता है। भागवत के अनुसार, आज दुनिया जिन अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, उनके बीच यह दृष्टिकोण लोगों को विभाजन और टकराव के बजाय परस्पर जुड़ाव तथा सह-अस्तित्व का रास्ता दिखा सकता है।

भागवत ने इस दौरान संघ के कार्य और उसकी विचारधारा को भी इसी व्यापक भावना से जोड़कर प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संगठन के स्वयंसेवकों के व्यवहार में अपनापन और प्रेम दिखाई देता है। उनके मुताबिक, यही भावना संघ के कार्य को निरंतर आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती है और एक सदी पूरी होने के बाद भी संगठन के काम में इसकी भूमिका बनी हुई है।

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