उत्तराखंड की लोक आस्था, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी मां नंदा देवी की बड़ी जात शनिवार को चमोली के सिद्धपीठ कुरुड़ से विधिवत शुरू हो गई। सदियों पुरानी लोक परंपरा के अनुसार मां नंदा अपने मायके से ससुराल की ओर विदा हुईं तो कुरुड़ का माहौल भक्ति और भावुकता से भर उठा। सुबह से ही मंदिर परिसर में पूजा-अनुष्ठान का दौर चलता रहा और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां नंदा के दर्शन के लिए पहुंचे।
धार्मिक अनुष्ठानों के बीच देवी ने पशुआ पर रूप धारण किया। इसके बाद विधि-विधान से माता की आज्ञा ली गई और उनकी डोली को यात्रा के लिए आगे बढ़ाया गया। ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और मां नंदा के जयकारों के बीच डोली मंदिर से बाहर निकली। इस दौरान श्रद्धालुओं ने भावुक होकर मां नंदा को विदाई दी और उनकी मंगल यात्रा की कामना की।
मां नंदा की बड़ी जात केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं का जीवंत स्वरूप है। पहाड़ में बेटी के मायके से ससुराल विदा होने की परंपरा को मां नंदा की यात्रा से जोड़ा जाता है। इसी भाव के साथ श्रद्धालु देवी को अपनी बेटी और बहन के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि नंदा की विदाई का दृश्य लोगों को भावुक कर देता है।
इस बार मां नंदा की यात्रा करीब 280 किलोमीटर लंबी होगी और अगले 20 दिनों तक अलग-अलग पड़ावों से होकर आगे बढ़ेगी। यात्रा के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रीति-रिवाजों, धार्मिक अनुष्ठानों और लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। इसी कारण नंदा देवी की यात्रा को पहाड़ का ‘महाकुंभ’ भी कहा जाता है।
तीनों डोलियां अपने-अपने मार्ग पर रवाना
मायके से ससुराल की ओर निकली मां नंदा की तीनों डोलियां अब अपने-अपने निर्धारित यात्रा मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं। बधाण क्षेत्र की डोली आज चरबंगा के लिए रवाना हुई, जबकि दसौली क्षेत्र की डोली कुमजुग की ओर बढ़ी। कुरुड़ से निकलने के बाद जगह-जगह श्रद्धालु डोलियों का स्वागत कर रहे हैं और मां नंदा के दर्शन कर आशीर्वाद ले रहे हैं।
इस वर्ष की बड़ी जात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि कुरुड़ से होने वाली बड़ी जात और वर्ष 2027 में प्रस्तावित नौटी राजजात को लेकर विवाद के बीच यह आयोजन हो रहा है। इसके बावजूद मां नंदा की आस्था से जुड़ी यह यात्रा अपनी लोक परंपरा, श्रद्धा और सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ रही है।

