गणेश चतुर्थी के साथ सोमवार, 14 सितंबर से गणेशोत्सव की शुरुआत हो गई है। देशभर में श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा-अर्चना के साथ घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति स्थापना कर रहे हैं। दस दिवसीय गणेशोत्सव को लेकर भक्तों में उत्साह है। इस दौरान भगवान गणेश को प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता और मंगलकारी देवता के रूप में श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। इस दिन गणपति स्थापना से लेकर नियमित पूजा और विसर्जन तक विशेष धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है।
गणपति स्थापना के लिए पांच शुभ मुहूर्त
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करने के लिए दिनभर में पांच शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। श्रद्धालु अपनी सुविधा और स्थानीय पंचांग में दिए गए समय के अनुसार इन मुहूर्तों में गणपति स्थापना कर सकते हैं। पूजा के लिए घर में स्वच्छ स्थान का चयन किया जाता है। इसके बाद चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। स्थापना से पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई और सजावट की जाती है। मान्यता है कि विधि-विधान से गणपति स्थापना करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है।
मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने का विधान
धार्मिक ग्रंथों में घर की पूजा के लिए मिट्टी की छोटी गणेश प्रतिमा स्थापित करने का विधान मिलता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार प्रतिमा का चयन करते हैं। मिट्टी की प्रतिमा को प्राकृतिक और पूजनीय स्वरूप माना जाता है। घर में गणपति स्थापना के लिए बड़ी प्रतिमा की अनिवार्यता नहीं है। श्रद्धा और विधिपूर्वक की गई पूजा को ही प्रमुख माना गया है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने और विसर्जन के लिए भी प्राकृतिक विकल्प अपनाने पर जोर दिया जाता है।
रोज सुबह-शाम होगी भगवान गणेश की पूजा
गणपति स्थापना के बाद गणेशोत्सव के दौरान प्रतिदिन सुबह और शाम भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा है। पूजा में दीपक जलाने के साथ दूर्वा, फूल और भोग अर्पित किया जाता है। भगवान गणेश को दूर्वा विशेष प्रिय मानी जाती है। श्रद्धालु पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जाप करते हैं और आरती करते हैं। कई घरों में मोदक, लड्डू और अन्य मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। भक्त भगवान गणेश से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और सभी प्रकार के विघ्न दूर करने की प्रार्थना करते हैं। गणेशोत्सव के दौरान श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार व्रत, पूजा और धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं।
गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा देखने से बचने की मान्यता
गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा देखने से बचने का धार्मिक विधान भी बताया गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से मिथ्या कलंक लगने का भय रहता है। इसी कारण श्रद्धालु गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन से बचते हैं। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान गणेश की पूजा और उनकी कथा का विशेष महत्व माना गया है। यदि किसी कारणवश चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो मान्यता के अनुसार भगवान गणेश की पूजा और संबंधित धार्मिक उपाय किए जाते हैं।
25 सितंबर को होगा मुख्य गणपति विसर्जन
गणेशोत्सव का मुख्य विसर्जन अनंत चतुर्दशी के अवसर पर 25 सितंबर को होगा। इस दिन श्रद्धालु भगवान गणेश की प्रतिमा का विधि-विधान से पूजन कर विसर्जन करेंगे। घरों और सार्वजनिक पंडालों में स्थापित गणपति प्रतिमाओं को श्रद्धालु श्रद्धा के साथ विदाई देंगे। विसर्जन से पहले आरती, भोग और प्रार्थना की जाती है। भक्त भगवान गणेश से अगले वर्ष फिर आने की कामना करते हैं। गणेशोत्सव के दौरान पूजा, भक्ति और धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक सद्भाव का संदेश भी दिया जाता है। श्रद्धालुओं से पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित और प्राकृतिक तरीके से गणपति विसर्जन करने की अपील की जाती है।

