बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिहार सरकार से पूछा है कि कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह कानून और संविधान की व्याख्या से जुड़ा मामला है, इसलिए राज्य सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वर्तमान स्थिति संविधान के अनुरूप कैसे है।
दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया है कि वह न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के, इसके बावजूद मंत्री पद पर बने हुए हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान के तहत किसी गैर-विधायक को मंत्री बनाए जाने पर उसे केवल छह महीने की अवधि के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना होता है। यह छूट अस्थायी व्यवस्था के रूप में दी गई है, न कि लंबे समय तक मंत्री पद पर बने रहने के लिए।
सुनवाई के दौरान एक अहम सवाल यह भी उठा कि क्या कोई मंत्री छह महीने की समय सीमा पूरी होने से पहले पद छोड़कर, नई सरकार बनने पर दोबारा मंत्री पद की शपथ लेकर इस अवधि को फिर से शून्य कर सकता है। याचिका में इसी संवैधानिक व्याख्या को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस मुद्दे का असर भविष्य में ऐसे सभी मामलों पर पड़ सकता है, जहां गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को मंत्री बनाया जाता है।
मंत्री दीपक प्रकाश के कार्यकाल पर विवाद क्यों?
याचिका के अनुसार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 अप्रैल 2026 को पद छोड़ने से पहले दीपक प्रकाश पंचायती राज मंत्री के रूप में चार महीने और 26 दिन तक कार्य कर चुके थे। सरकार के कार्यकाल के समाप्त होने के साथ उनका मंत्री पद भी समाप्त हो गया। इसके बाद करीब 22 दिनों तक उन्होंने कोई मंत्री पद नहीं संभाला। हालांकि, 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के बाद दीपक प्रकाश ने फिर से मंत्री पद की शपथ ले ली।
विवाद की जड़ यही है कि उस समय भी दीपक प्रकाश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। याचिकाकर्ता का कहना है कि पहले और दूसरे कार्यकाल को जोड़कर देखा जाए तो उनका कुल मंत्री कार्यकाल छह महीने की संवैधानिक सीमा से अधिक हो चुका है। ऐसे में उनका मंत्री पद पर बने रहना संविधान के अनुच्छेद 164(4) की भावना के विपरीत माना जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्री नियुक्त किया जाता है लेकिन वह राज्य विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं होने पर वह मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार खो देता है। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि क्या सरकार बदलने और दोबारा शपथ लेने से छह महीने की यह संवैधानिक अवधि फिर से शुरू मानी जा सकती है या नहीं।
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बिहार सरकार से इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। राजनीतिक और कानूनी हलकों में इस मामले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में गैर-निर्वाचित व्यक्तियों की मंत्री नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल स्थापित कर सकता है। फिलहाल सभी की नजरें बिहार सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई हैं।

