August 21, 2026
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RBI ने बैंकों को बड़ी राहत दी: IFR अनिवार्यता खत्म, CRAR नियमों में ढील से बढ़ेगी कर्ज देने की क्षमता

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को बैंकों के लिए बड़ा नियामकीय बदलाव करते हुए कमर्शियल बैंकों पर लागू Investment Fluctuation Reserve (IFR) की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि इस कदम से बैंकों की पूंजी स्थिति अधिक मजबूत और लचीली होगी।
क्या था IFR और क्यों हटाया गया
अब तक बैंकों को IFR के रूप में अतिरिक्त रिजर्व रखना पड़ता था, ताकि निवेश पोर्टफोलियो की वैल्यू में गिरावट से होने वाले संभावित नुकसान को संभाला जा सके। RBI ने कहा कि बैंक पहले से ही बाजार जोखिम के लिए पर्याप्त पूंजी रखते हैं और निवेश से जुड़े नियामकीय ढांचे भी मजबूत हैं। ऐसे में अलग से IFR बनाए रखना जरूरी नहीं रह गया है।
यह फैसला सभी कमर्शियल बैंकों और लोकल एरिया बैंकों पर लागू होगा, जबकि स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक इस दायरे से बाहर रहेंगे। RBI ने यह भी संकेत दिया कि बाकी श्रेणी के बैंकों के लिए नियमों को स्पष्ट और समान बनाने हेतु जल्द ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी की जाएंगी।
CRAR नियमों में भी प्रस्तावित राहत
RBI ने पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) से जुड़े नियमों में भी ढील देने का प्रस्ताव रखा है। अब बैंकों को तिमाही मुनाफे को पूंजी में जोड़ने के लिए पहले जैसी सख्त शर्तों का पालन नहीं करना होगा। NPA प्रावधान से जुड़ी सीमा हटाने की योजना है, जिससे बैंकों को अपनी पूंजी स्थिति दिखाने में अधिक लचीलापन मिलेगा।
मौद्रिक नीति बैठक में फैसले
ये निर्णय मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के दौरान लिए गए। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई बैठक में रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा गया। साथ ही केंद्रीय बैंक ने वेस्ट एशिया में जारी तनाव जैसे वैश्विक जोखिमों को अर्थव्यवस्था के लिए संभावित चुनौती बताया।
इस फैसले से बैंकों पर अतिरिक्त रिजर्व का दबाव कम होगा और उनकी बैलेंस शीट मजबूत दिखेगी। इससे कर्ज वितरण बढ़ने की संभावना है, जो आर्थिक गतिविधियों को गति देने में मदद कर सकता है।

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