राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ केवल शब्दों का समूह नहीं है, यह उस भारत की आत्मा है जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का संकल्प लिया था। यह गीत देश की मिट्टी, मां के रूप में राष्ट्र की कल्पना और स्वतंत्रता संग्राम की चेतना से जुड़ा हुआ है। स्कूलों की प्रार्थना सभाओं से लेकर ऐतिहासिक आंदोलनों तक, वंदे मातरम ने करोड़ों भारतीयों को एक सूत्र में बांधा है। लेकिन विडंबना यह है कि आज उसी राष्ट्रीय गीत को लेकर देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद में तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में वंदे मातरम के सम्मान, उसकी भावना और उसके स्थान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। दरअसल राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने के मौके पर भारत सरकार की ओर से सालभर का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस क्रम में 8 दिसंबर को लोकसभा और 8 दिसंबर को राज्यसभा में चर्चा की गई। सोमवार को लोकसभा में वंदेमातरम के 150 साल पूरे होने पर चर्चा की गई। इसकी शुरूआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। इस दौरान उन्होंने वंदे भारत के 4 खंड हटाने के लिए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग के डर से कांग्रेस ने वंदे भारत का अपमान किया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि किस तरह इस गीत ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष कर रहे लाखों लोगों में नई ऊर्जा भरी थी। उनके मुताबिक, राष्ट्रीय प्रतीकों पर सवाल उठाना या उन्हें राजनीतिक चश्मे से देखना देश की एकता और अखंडता के लिए उचित नहीं है। प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद विपक्षी खेमे में असहजता दिखी। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सरकार पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाया। विपक्षी सांसदों का कहना था कि किसी भी राष्ट्रीय गीत या प्रतीक का सम्मान स्वाभाविक और सर्वसम्मत होता है, लेकिन उसे किसी राजनीतिक एजेंडे से जोड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। लोकसभा में इस मुद्दे पर हुई चर्चा ने जल्द ही सियासी रंग ले लिया और बहस का स्वर तीखा होता चला गया। इसके बाद यह मामला राज्यसभा तक पहुंचा, जहां केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वंदे मातरम को लेकर विपक्ष पर सीधा और करारा हमला बोला। अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वंदे मातरम का विरोध या उस पर सवाल उठाना देश की आजादी की लड़ाई का अपमान है। उन्होंने कहा कि यह गीत किसी एक पार्टी या विचारधारा का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। शाह ने यह भी जोड़ा कि जो लोग वंदे मातरम बोलने या उसका सम्मान करने में संकोच करते हैं, उन्हें देश के इतिहास को समझने की जरूरत है। अमित शाह के इस बयान के बाद राज्यसभा में हंगामा और तेज हो गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सांसद अपनी सीटों से खड़े होकर विरोध जताने लगे। कांग्रेस नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने आजादी की लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है और उन्हें देशभक्ति का प्रमाण पत्र देने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस सांसदों ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही है।कांग्रेस नेताओं ने कहा कि वंदे मातरम का सम्मान हर भारतीय करता है, लेकिन इसे जबरन किसी राजनीतिक बहस का केंद्र बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना था कि देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दे कहीं ज्यादा गंभीर हैं, लेकिन सरकार इनसे ध्यान हटाने के लिए भावनात्मक मुद्दों को उछाल रही है। विपक्ष के अन्य दलों, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और वाम दलों के नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान जैसे विषय संवेदनशील होते हैं और इन पर सहमति और सम्मान की भावना के साथ चर्चा होनी चाहिए, न कि आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक लाभ के लिए। वहीं विपक्षी सांसदों ने यह भी कहा कि देशभक्ति को साबित करने की जरूरत नहीं होती, यह व्यक्ति के कर्मों से झलकती है। लोकसभा में प्रियंका गांधी ने सवाल पूछा कि ये गीत 150 साल से देश की आत्मा का हिस्सा है। 75 सालों से लोगों के दिल में बसा है। फिर आज इस पर बहस क्यों हो रही है। प्रियंका गांधी ने कहा- क्योंकि बंगाल का चुनाव आ रहा। मोदी जी उसमें अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए। जवाहरलाल नेहरू जिन्ना के सामने झुके थे। वंदे मातरम आजादी के समय से प्रेरणा का स्त्रोत था तो फिर उसके साथ पिछले दशक में अन्याय क्यों हुआ। भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा- वंदे मातरम् राष्ट्रभक्तों के लिए एनर्जी है। कुछ लोगों को इससे एलर्जी है। अब जिन्ना के मुन्ना को भी वंदे मातरम् से दिक्कत है। सपा प्रमुख और सांसद अखिलेश यादव ने कहा, ‘शजिस वंदे मातरम् ने आजादी के आंदोलन को जोड़ा, आज के दरारवादी लोग उसी से देश को तोड़ना चाहते हैं। वंदे मातरम गाने के लिए नहीं, बल्कि निभाने के लिए है। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह माहौल गरमाया रहा।
सोशल मीडिया पर भी वंदे मातरम को लेकर बहस छिड़ गई—
सोशल मीडिया पर भी वंदे मातरम को लेकर बहस छिड़ गई। कुछ लोग सरकार के पक्ष में खड़े दिखे और उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान अनिवार्य है। वहीं, कुछ लोगों ने विपक्ष के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि देशभक्ति को किसी एक विचारधारा की बपौती नहीं बनाया जा सकता। शीतकालीन सत्र के दौरान वंदे मातरम पर हुई यह बहस सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने पूरे देश में एक बड़े विमर्श को जन्म दे दिया। सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय गीत जैसे विषयों को राजनीतिक बहस से दूर रखा जाना चाहिए, या फिर इन्हें भी वैचारिक टकराव का हिस्सा बनने दिया जाएगा। वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का प्रतीक है। संसद में हुआ यह टकराव इस बात की याद दिलाता है कि राष्ट्रीय एकता और सम्मान जैसे मुद्दों पर संतुलन और संवेदनशीलता बेहद जरूरी है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मतभेद हों, लेकिन राष्ट्र के प्रतीकों पर सर्वसम्मति और सम्मान बना रहे। यह पहला मौका नहीं है जब वंदे मातरम संसद या राजनीति के केंद्र में आया हो। इससे पहले भी अलग-अलग समय पर राष्ट्रीय गीत और नारों को लेकर बहस होती रही है। हाल के वर्षों में स्कूलों और कॉलेजों में वंदे मातरम के गायन और इसके स्वरूप को लेकर भी चर्चाएं सामने आती रही हैं।
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया वंदे मातरम गीत ने अंग्रेजों शासन की नींव हिला दी थी–
वंदे मातरम सिर्फ एक राष्ट्रीय गीत नहीं है बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा कहा जाता है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखी गई इस गीत ने भारत नें अंग्रेजों शासन की नींव हिला कर रख दी थी। सबसे पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में इस गीत का प्रकाशण हुआ। इसके बाद बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे अपने अमर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया जो 1882 में प्रकाशित हुआ था। उपन्यास आनंद मठ से निकलकर पूरे भारत की रगों में यह गीत दौड़ने लगी। जिस-जिस क्रांतिकारी ने इसे सुना, उनके दिल में यह गीत घर कर गई। जेल की कोठरियां, फांसी का तख्ता, दमन की नीतियां। अंग्रेजों की कोई भी ताकत इस गीत की प्रेरणा को रोक नहीं पाया। वंदे मातरम की गूंज देश से निकलकर पूरी दुनिया में सुनाई देने लगी थी। साल 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में जब भीकाजी कामा ने पहली बार भारतीय तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फहराया, उस ध्वज पर ‘वंदे मातरम्’ गर्व से लिखा था। एक ऐसा संदेश, जिसने दुनिया को भारत के स्वतंत्रता-संकल्प से पहली बार परिचित कराया। इंग्लैंड में फांसी का सामना करते हुए मदनलाल धींगरा के होठों पर भी अंतिम क्षणों में यही शब्द थे ‘वंदे मातरम। दक्षिण अफ्रीका में गोपालकृष्ण गोखले के स्वागत के दौरान भी यही गूंज सुनाई दी। विदेशों में बसे भारतीयों ने इसे स्वतंत्रता की पुकार मानकर अपनाया और यही गीत उन सभी दिलों की धड़कन बन गया, जो भारत को गुलामी से मुक्त देखने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
इस गीत की रचना भले ही बंगाल में हुई। गीत में संस्कृत-बांग्ला का मिश्रण है, लेकिन सीमाओं के परे यह गीत पूरे देश में गूंज रही थी। आखिर में अंग्रेज हताश होकर 1907 में इसके गायन पर पाबंदी लगा दी थी। इस गीत से परेशान होकर अंग्रेजो नें ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाई। हिंदुओं-मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग के नेताओं में यह जहर घोल दिया कि इस गीत को इस्लाम विरोधी और संप्रादियक बताने में कामयाब हो गए। साल 1909 के अमृतसर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने “वंदे मातरम्” का विरोध किया। लीग के अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक और इस्लाम विरोधी करार देते हुए इसे अस्वीकार किया। लीग ने वंदे मातरम के गायन या पाठ को इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ बताया और कहा कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य के प्रति भक्ति या उपासना का कोई स्थान नहीं है। एक तरफ जहां देशभर में स्वतंत्रा सेनानी ‘वंदे मातरम’ गीत को अंग्रेजों के खिलाफ एक शस्त्र बना चुके थे। वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम लीग इस गीत कर रहे थे। कांग्रेस के नेताओं की चिंता बढ़ गई। आखिर में कांग्रेस ने समाधान के रास्ते की तलाश की जिम्मेदारी पार्टी की एक कमेटी को सौंपी। साल 1937 में इस कमेटी ने “वंदे मातरम्” का विरोध करने वालों की शिकायतें पर गौर किया। रवींद्र नाथ टैगोर, नेहरू, अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस की सदस्यता वाली इस कमेटी ने बीच का रास्ता निकाला। कमेटी ने न तो गीत को पूरी तौर पर स्वीकार किया और न पूरी तौर पर अस्वीकार। हल निकाला गया कि गीत के शुरू के दो पद्य दो गाए जाएंगे जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं है। साल 1950 में संविधान सभा ने सर्वसम्मति से वंदे मातरम को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था वंदे मातरम ने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, इसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा।

