September 11, 2026
Daily Lok Manch
उत्तराखंड

जमीन का अब बनेगा ‘भू-आधार’, 14 अंकों की डिजिटल पहचान से जुड़ेंगे नक्शा, रजिस्ट्री और जमीन के रिकॉर्ड

जमीन से जुड़े कागजात अब अलग-अलग दफ्तरों और रिकॉर्ड में बिखरे नहीं रहेंगे। केंद्र सरकार ने भूमि रिकॉर्ड को एकीकृत और डिजिटल बनाने की दिशा में डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) 3.0 की नई व्यवस्था शुरू की है। इसके तहत देशभर के भूखंडों को 14 अंकों की विशिष्ट डिजिटल पहचान संख्या, यानी यूनिवर्सल लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (यूएलपीआईएन) दिया जाएगा, जिसे ‘भू-आधार’ के नाम से जाना जा रहा है।

सरकार ने इस नई व्यवस्था के लिए 565.50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसका उद्देश्य जमीन के अलग-अलग रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर ऐसा डिजिटल तंत्र तैयार करना है, जिसमें किसी भूखंड की स्थिति, नक्शा, राजस्व रिकॉर्ड और पंजीकरण से जुड़ी जानकारी एक-दूसरे से जुड़ी हो। इससे जमीन की पहचान और रिकॉर्ड की जांच पहले के मुकाबले काफी आसान हो सकेगी।

अभी किसी जमीन की पूरी स्थिति जानने के लिए खाता, खसरा या प्लाट नंबर वाले राजस्व रिकॉर्ड, जमीन का नक्शा, रजिस्ट्री और अन्य दस्तावेज अलग-अलग देखने पड़ते हैं। यदि जमीन पर बैंक का कर्ज है या उससे संबंधित कोई विवाद चल रहा है तो उसकी जानकारी भी अलग माध्यम से मिलती है। नई डिजिटल व्यवस्था में इन सूचनाओं को आपस में जोड़ने पर खरीदार के लिए जमीन की वास्तविक स्थिति जांचना आसान होगा।

भू-आधार मिलने के बाद संबंधित भूखंड के डिजिटल नक्शे, अधिकार अभिलेख और पंजीकरण से जुड़ी जानकारी को एकीकृत तरीके से देखा जा सकेगा। कागज में दर्ज जमीन वास्तव में कहां है और उसकी सीमा क्या है, इसका मिलान डिजिटल नक्शे से किया जा सकेगा। इससे गलत जमीन दिखाकर बिक्री करने और सीमा विवाद जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था से किसानों को संस्थागत ऋण लेने में भी सुविधा मिलेगी। जमीन के रिकॉर्ड डिजिटल और आपस में जुड़े होने से बैंकों के लिए संबंधित संपत्ति की जानकारी की जांच आसान होगी। साथ ही लोगों को छोटे-छोटे रिकॉर्ड के लिए बार-बार राजस्व और पंजीकरण कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम हो सकती है। डीआईएलआरएमपी का उद्देश्य भूमि विवादों और फर्जी लेन-देन की गुंजाइश कम करना तथा भूमि रिकॉर्ड तक आसान ऑनलाइन पहुंच उपलब्ध कराना है।

भूमि से जुड़े न्यायालयी मामलों को भी भूमि रिकॉर्ड और पंजीकरण डाटाबेस से जोड़ने की दिशा में काम चल रहा है। इससे किसी संपत्ति से जुड़े लंबित मामलों की जानकारी सामने लाने और अदालतों को संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

हालांकि, भू-आधार को जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र नहीं माना जाएगा। जमीन का वास्तविक स्वामित्व संबंधित राज्य के वैध भूमि रिकॉर्ड और वहां लागू कानूनों के आधार पर ही तय होगा। केंद्र सरकार के भूमि संसाधन विभाग के अनुसार, भूखंडों को भू-आधार देने का लक्ष्य उनके नक्शों को भौगोलिक पहचान से जोड़ना है।

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