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July 6, 2026
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यूएन की चेतावनी : अल नीनो से भारत में कमजोर पड़ सकता है मानसून, खेती पर मंडरा रहा संकट

प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली जलवायु संबंधी घटना अल नीनो ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अल नीनो का नया दौर भारत सहित एशिया के कई देशों की कृषि व्यवस्था, खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। विशेष रूप से भारत में मानसून के कमजोर रहने की आशंका जताई गई है, जिससे वर्षा आधारित खेती पर व्यापक असर पड़ सकता है।

एफएओ की रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो के प्रभाव से भारत के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। मानसून की कमी का सीधा असर खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों धान और मक्का पर पड़ सकता है, क्योंकि इन फसलों की खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर करती है। पर्याप्त वर्षा नहीं होने की स्थिति में खेतों में नमी की कमी होगी, जिससे फसलों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो किसानों की लागत बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें सिंचाई के वैकल्पिक साधनों पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ-साथ छोटे और सीमांत किसानों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है। कई क्षेत्रों में जलाशयों और भूजल स्तर पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

एफएओ ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि अल नीनो का प्रभाव केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने से वैश्विक बाजारों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। कई देशों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अधिक आयात करना पड़ सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ेगी और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

रिपोर्ट में भारत के अलावा पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया और तिमोर-लेस्ते जैसे देशों में भी सूखे का खतरा बढ़ने की आशंका जताई गई है। इन देशों की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, इसलिए मौसम में बदलाव का असर सीधे आजीविका और खाद्य उपलब्धता पर पड़ सकता है।

जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो की स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर कृषि क्षेत्र के साथ-साथ जल संसाधनों, ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में सरकारों और कृषि संस्थानों के सामने चुनौती होगी कि वे किसानों को समय पर सलाह, सिंचाई सुविधाएं और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराएं, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके। फिलहाल सभी की नजरें आगामी मानसून की प्रगति पर टिकी हैं, जो आने वाले महीनों में कृषि और खाद्य सुरक्षा की दिशा तय करेगी।

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