हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष को पितरों के स्मरण, तर्पण और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों को याद कर उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों का स्मरण और विधि-विधान से किए गए कर्मकांड का विशेष महत्व होता है। यही वजह है कि इन दिनों विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक और शुभ कार्यों से आमतौर पर परहेज किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में किसी को शुभकामना देने के बजाय पितरों के प्रति श्रद्धा और स्मरण को प्राथमिकता दी जाती है।
इस वर्ष श्राद्ध पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होने जा रही है। उज्जैन में सिद्धवट, रामघाट और शिप्रा नदी के अन्य घाटों पर देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। श्रद्धालु यहां पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करेंगे। महालय श्राद्ध के दौरान पितरों का तर्पण करने और उनकी स्मृति में धार्मिक कर्म करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार श्राद्ध पक्ष को ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्य अमर डिब्बेवाला के मुताबिक करीब 60 साल बाद वर्ष 2026 में ऐसा विशेष ग्रह संयोग बन रहा है, जिसकी तुलना 1966 की ग्रह स्थिति से की जा रही है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु और शनि की विशेष स्थिति इस वर्ष दोबारा बन रही है। इसी कारण इस बार का 16 दिन का श्राद्ध पक्ष धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार महालय श्राद्ध की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा यानी 26 सितंबर से होगी। इसके बाद श्राद्ध पक्ष का क्रम आश्विन कृष्ण पक्ष की तिथियों के साथ आगे बढ़ेगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। खास बात यह है कि इस बार श्राद्ध पक्ष की शुरुआत शनिवार से होगी और इसका समापन भी शनिवार को ही सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा।
श्राद्ध पक्ष में इन बातों का रखा जाता है ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में परिवार के लोग अपनी क्षमता के अनुसार पितरों के लिए श्राद्ध कर्म, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं। जिन लोगों के पूर्वजों की मृत्यु की तिथि ज्ञात होती है, वे उसी तिथि के दिन श्राद्ध करते हैं, जबकि जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान सात्विक भोजन करने, पितरों का स्मरण करने और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा भी है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार श्राद्ध पक्ष में बुधादित्य योग के साथ केंद्र-त्रिकोण और एकादश भाव से जुड़े विशेष योग बनने की बात कही गई है। इन ग्रह स्थितियों के कारण भी इस बार के श्राद्ध पक्ष को विशेष बताया जा रहा है। धार्मिक दृष्टि से यह समय परिवार की परंपराओं के अनुसार पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस दौरान लोग सामान्य तौर पर नए और मांगलिक कार्यों की शुरुआत नहीं करते। हालांकि रोजमर्रा के आवश्यक कार्य किए जा सकते हैं। श्राद्ध पक्ष का उद्देश्य उत्सव मनाने के बजाय पूर्वजों का स्मरण, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए धार्मिक कर्म करना माना जाता है।

