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January 21, 2026
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“दस मिनट में ग्रॉसरी आपके द्वार”, जब सुविधा “जान” पर भारी पड़ने लगे



हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां ज़रूरत और जल्दबाजी के बीच की रेखा धीरे-धीरे मिटती जा रही है। घर की रसोई में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि राशन खत्म होने से कई दिन पहले ही चिंता शुरू हो जाती है। कहा जाता है कि अगर आज सामान नहीं आया तो शाम का खाना नहीं बनेगा। इसी चिंता के चलते काम से लौटता व्यक्ति किराना दुकान से सामान लेकर ही घर आता है। जबकि सच्चाई यह होती है कि घर में अभी भी कई दिनों का राशन मौजूद रहता है। यह बात महिला और पुरुष-दोनों अच्छी तरह जानते हैं, फिर भी मन में यह दबाव बना रहता है कि जिस दिन कहा गया है, उसी दिन सामान घर पहुंचना चाहिए। सवाल यहीं से जन्म लेता है कि जब रसोई के सामान की वास्तव में इतनी आपात आवश्यकता नहीं होती, तो फिर “10 मिनट में ग्रॉसरी आपके द्वार” जैसे कॉन्सेप्ट की जरूरत किसे पड़ी और क्यों पड़ी? पिछले कुछ वर्षों में ई-कॉमर्स क्षेत्र ने जिस तेज़ी से विस्तार किया है, उसने खरीदारी की आदतों को पूरी तरह बदल दिया है। एक समय था जब अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां एक या दो दिन में सामान की डिलीवरी को बड़ी सुविधा के रूप में पेश करती थीं। उपभोक्ता भी उसी में संतुष्ट थे। लेकिन अब उसी बाजार में क्विक-कॉमर्स का दौर आ गया है। ब्लिंकिट, जेप्टो और इसी तरह के कई ऐप्स यह दावा कर रहे हैं कि वे किसी भी तरह का सामान, खासकर रोजमर्रा की ग्रॉसरी, महज 10 मिनट में घर पहुंचा सकते हैं। तकनीकी रूप से यह संभव भी हो रहा है, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई और इसकी कीमत पर अब सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ग्रॉसरी की 10 मिनट में डिलीवरी किसे चाहिए? क्या उपभोक्ता को इससे कोई ऐसा बड़ा लाभ मिल रहा है, जिसके बिना जीवन ठहर जाए? या फिर यह केवल बाजार द्वारा बनाई गई एक कृत्रिम जरूरत है, जिसे धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में बैठा दिया गया है? इन ऐप्स के जरिए बड़ी-बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों ने हजारों युवाओं को रोज़गार तो दिया है, लेकिन किस तरह का रोजगार यह भी सोचने वाली बात है। अधिकांश डिलीवरी राइडर आज एक तरह से दिहाड़ी मजदूर बनकर रह गए हैं, जिन्हें पूरे दिन ऐप से मिलने वाले टास्क पूरे करने होते हैं। उनका काम केवल पैकेट उठाना और तय समय सीमा के भीतर उसे किसी भी हाल में ग्राहक तक पहुंचाना बन गया है। शुरुआत में लोगों को 10 मिनट की डिलीवरी का यह कॉन्सेप्ट आकर्षक लगा। लगा कि समय की बचत हो रही है, सुविधा बढ़ रही है। लेकिन अब धीरे-धीरे इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। यह सुविधा अब जान पर आफत बनती जा रही है। 10 मिनट में डिलीवरी पूरी करने के दबाव ने शहरों की सड़कों को और अधिक खतरनाक बना दिया है। आए दिन क्विक-कॉमर्स ऐप्स के बाइक राइडरों के हादसे सामने आ रहे हैं। तेज रफ्तार, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी और समय से पहले पहुंचने की हड़बड़ी इन सबने दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ा दी है। एक तरफ राज्य सरकारें शहरों में रैश ड्राइविंग पर अंकुश लगाने के लिए जागरूकता अभियान चला रही हैं, चालान और सख्ती की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ 10 मिनट की डिलीवरी का यह मॉडल उन तमाम प्रयासों पर पानी फेरता दिखाई देता है। देहरादून जैसे शहर, जिसे अब मेट्रो सिटी की श्रेणी में गिना जाने लगा है, वहां भी यह समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। सरकार लगातार लोगों को तेज रफ्तार वाहन चलाने के खतरों से आगाह कर रही है, लेकिन दूसरी ओर क्विक-कॉमर्स ऐप्स के बाइक राइडर समय के दबाव में नियमों को ताक पर रखकर सड़कों पर दौड़ रहे हैं। हाल ही में देहरादून में घटी एक घटना इस खतरे की गंभीरता को साफ़ तौर पर सामने लाती है। 10 मिनट की डिलीवरी के दबाव में तेज रफ्तार से जा रहे एक बाइक राइडर ने स्कूटी सवार महिला को टक्कर मार दी। महिला ने बाकायदा इंडिकेटर देकर सड़क पार करने का संकेत दिया था, फिर भी बाइक सवार इतनी तेजी में था कि वह समय पर ब्रेक तक नहीं लगा सका। सौभाग्य से महिला को गंभीर चोट नहीं आई, लेकिन यह केवल किस्मत का खेल था। सवाल यह है कि अगर उस बाइक राइडर पर समय का इतना दबाव न होता, तो क्या वह इतनी लापरवाही से वाहन चला रहा होता? यहीं से यह बहस और गहरी हो जाती है कि 10 मिनट में डिलीवरी का यह कॉन्सेप्ट आखिर किसके लिए बनाया गया है। क्या इससे ग्राहक को कोई ऐसा ठोस लाभ हुआ है, जो उसकी सुरक्षा से बड़ा हो? क्या इससे डिलीवरी का काम करने वाले बाइक राइडरों की आर्थिक स्थिति में कोई वास्तविक सुधार आया है? क्या 10 मिनट में मिलने वाली ग्रॉसरी, पास के स्टोर से मिलने वाली ग्रॉसरी की तुलना में सस्ती है? या फिर सच्चाई यह है कि न तो ग्राहक को कोई बड़ा आर्थिक फायदा मिल रहा है और न ही राइडर की जिंदगी आसान हो रही है। असल में नुकसान कई स्तरों पर हो रहा है। सबसे पहले, डिलीवरी राइडर लगातार मानसिक दबाव में जी रहा है। उसे हर पल यह डर सताता रहता है कि अगर वह समय पर डिलीवरी नहीं कर पाया तो उसकी रेटिंग गिर जाएगी, इंसेंटिव कट जाएगा, ऐप उसे लॉग आउट कर देगा या फिर उसकी आईडी ही ब्लॉक कर दी जाएगी। यही डर उसे ओवरस्पीडिंग, रेड लाइट जंप करने और जोखिम भरे फैसले लेने पर मजबूर करता है। दूसरी ओर, सड़क पर चलने वाला आम आदमी भी इस जल्दबाजी का शिकार बन रहा है, जो पूरी सावधानी के बावजूद किसी तेज रफ्तार बाइक की चपेट में आ सकता है। इस मुद्दे को लेकर आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भी संसद में चिंता जताई है। उन्होंने राज्यसभा में इस 10 मिनट की डिलीवरी के खतरनाक कॉन्सेप्ट को लेकर सरकार को चेताया और कहा कि यह ट्रेंड डिलीवरी राइडरों की जान को गंभीर खतरे में डाल रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि समय पर रुकने, जैसे लाल बत्ती पर रुकने तक की स्थिति में डिलीवरी बॉय को नुकसान का डर सताने लगता है, जिसके चलते वह नियम तोड़ने पर मजबूर हो जाता है। सांसद ने सरकार से इस कॉन्सेप्ट पर रोक लगाने और राइडरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। 10 मिनट की डिलीवरी का यह मॉडल अब केवल सुविधा का मुद्दा नहीं रह गया है। यह सड़क सुरक्षा, श्रमिक अधिकार और सामाजिक ज़िम्मेदारी से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस सुविधा को हम प्रगति मान रहे हैं, वही हमारे लिए खतरे का कारण बनती जा रही है। क्योंकि आप भले ही संभलकर गाड़ी चलाएं, लेकिन अगर सामने से आने वाला व्यक्ति समय के दबाव में बेतहाशा रफ्तार से आ रहा हो, तो दुर्घटना से बच पाना हमेशा आपके हाथ में नहीं होता। यही वह सच्चाई है, जिसे नजरअंदाज करना अब और भी भारी पड़ सकता है।




“10 मिनट में डिलीवरी” पर रोक नहीं लगाई तो आने वाले दिनों में खतरनाक होंगे दुष्परिणाम–




क्विक-कॉमर्स के नाम पर 10 मिनट में डिलीवरी का चलन देश के कई शहरों में तेजी से फैलता जा रहा है। शुरुआत में इसे सुविधा और तकनीकी प्रगति के रूप में देखा गया, लेकिन अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। यदि केंद्र और राज्य सरकारों ने इस मॉडल पर समय रहते ठोस नियंत्रण नहीं किया, तो आने वाले दिनों में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं। सड़क सुरक्षा से लेकर श्रमिक अधिकारों तक, यह मुद्दा अब एक बड़ी राष्ट्रीय चिंता बनता जा रहा है। शहरी इलाकों में ट्रैफिक पहले ही अव्यवस्थित है। ऐसे में 10 मिनट की डिलीवरी का दबाव सड़कों पर जोखिम को कई गुना बढ़ा रहा है। तेज रफ्तार बाइक, ट्रैफिक सिग्नलों की अनदेखी और समय से पहले पहुँचने की हड़बड़ी अब आम दृश्य बनते जा रहे हैं। कई जगहों पर क्विक-कॉमर्स डिलीवरी से जुड़े हादसों में बढ़ोतरी की बात सामने आई है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो दुर्घटनाओं की संख्या और गंभीरता दोनों बढ़ सकती हैं। डिलीवरी राइडरों की स्थिति भी चिंता का विषय है। ऐप आधारित सिस्टम में रेटिंग और इंसेंटिव का ऐसा दबाव बनाया गया है कि राइडर अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हो जाते हैं। समय पर डिलीवरी न होने की स्थिति में उनके काम और कमाई पर सीधा असर पड़ता है। नतीजा यह होता है कि वे ओवरस्पीडिंग और नियम तोड़ने जैसे कदम उठाते हैं। यह व्यवस्था श्रमिकों के शोषण की ओर इशारा करती है। राज्यों के ट्रैफिक विभाग लगातार रैश ड्राइविंग को लेकर चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन क्विक-कॉमर्स का यह मॉडल उन प्रयासों को कमजोर कर रहा है। अगर केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं बनातीं, तो कानून व्यवस्था और सड़क सुरक्षा पर इसका असर और गहरा होगा। कुछ राज्यों में इस विषय पर शुरुआती चर्चा जरूर शुरू हुई है, लेकिन अभी तक कोई ठोस नीति सामने नहीं आई है। सामाजिक स्तर पर भी इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। आम नागरिक, पैदल यात्री और दोपहिया वाहन चालक इस जल्दबाजी का सबसे आसान शिकार बनते हैं। अगर समय रहते इस पर रोक या सख्त नियम नहीं बनाए गए, तो सुविधा के नाम पर देशभर में असुरक्षा का माहौल बढ़ सकता है। सरकार को न्यूनतम डिलीवरी समय तय करने, कंपनियों की जवाबदेही तय करने और राइडरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे कदम तुरंत उठाने चाहिए। अन्यथा 10 मिनट की यह दौड़ आने वाले समय में न केवल सड़कों पर, बल्कि पूरे समाज पर भारी पड़ सकती है।

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