यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन और केंद्र सरकार के द्वारा लाए गए नए नियम पर आज देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के 23 जनवरी को जारी किए गए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ वाले नियमों पर रोक लगा दी है। कई याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान व यूजीसी एक्ट, 1956 के खिलाफ बताया था। यह फैसला उन लोगों के लिए राहत की खबर है जिन्होंने इन नियमों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ये नियम समानता के सिद्धांत के खिलाफ हैं और कुछ समूहों को बाहर कर सकते हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ये नियम यूजीसी एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से फिलहाल इन नियमों को लागू होने से रोक दिया गया है। अब इस मामले पर आगे सुनवाई होगी और कोर्ट तय करेगा कि ये नियम मान्य हैं या नहीं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये नए नियम साफ नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए, कोर्ट ने इन नियमों पर तुरंत रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि 2012 में जो नियम थे, वही अब फिर से लागू होंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है।
UGC के नए कानून का नाम है- ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026।’ इसके तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई निर्देश दिए गए थे।
नए नियमों के तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने का निर्देश दिया गया। ये टीमें SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों को देखेंगी। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं।
हालांकि, सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि UGC ने जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि नए नियमों में सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए गए हैं। इनसे उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा।
भाजपा नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने UGC बिल के नए प्रावधानों का विरोध किया है। उन्होंने इसे समाज को बांटने वाला नियम बताया। उन्होंने कहा- एक समुदाय को शोषित और दूसरे को पीड़ित माना जा रहा है, जबकि कमेटी में शोषित समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं है।बृजभूषण ने कहा- मुझे नहीं पता कि यह कानून किसने बनाया, लेकिन इससे समाज में तनाव पैदा हो रहा है। यह केवल उच्च जाति के समुदाय का दर्द नहीं है; यह सभी समुदायों का दर्द है। OBC और दलित समुदायों के जो बच्चे हालात को समझते हैं, उन्हें इसके विरोध में आगे आना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने फिलहाल यूजीसी के नए रेगुलेशन पर रोक लगा दी है और स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि तब तक 2012 के यूजीसी रेगुलेशन ही लागू रहेंगे।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि उन्होंने यूजीसी के नए नियमों के सेक्शन 3सी को चुनौती दी है। उनका कहना था कि रेगुलेशन में भेदभाव की जो परिभाषा दी गई है, वह संविधान के अनुरूप नहीं है।
विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया कि संविधान के अनुसार, भेदभाव का प्रश्न देश के सभी नागरिकों से जुड़ा है, जबकि यूजीसी के नए नियमों में भेदभाव को केवल विशेष वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह परिभाषा न केवल अधूरी है, बल्कि संवैधानिक भावना के विपरीत भी है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत में दाखिला लेता है या उत्तर का छात्र दक्षिण में पढ़ने जाता है और उसके खिलाफ कोई अपमानजनक टिप्पणी की जाती है, जबकि दोनों पक्षों की जाति की जानकारी नहीं है, तो ऐसी स्थिति में कौन-सा प्रावधान लागू होगा?
इस पर विष्णु जैन ने जवाब दिया कि सेक्शन 3ई ऐसी परिस्थितियों को कवर करता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी के जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसके लिए अलग से प्रावधान मौजूद है और उस पर कार्रवाई की जा सकती है।
एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल उठाया कि यूजीसी के नए नियमों में रैगिंग से जुड़े प्रावधान क्यों हटाए गए हैं। उन्होंने आशंका जताई कि नया रेगुलेशन शिक्षा व्यवस्था को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेल रहा है। उनका कहना था कि भविष्य में ऐसा हो सकता है कि कोई फ्रेशर, जो सामान्य वर्ग से आता हो, पहले ही दिन अपराधी की तरह देखा जाने लगे और जेल तक पहुंच जाए। यह गंभीर चिंता का विषय है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं। सवाल यह है कि क्या इस नए कानून के जरिए हम और पीछे की ओर जा रहे हैं?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यूजीसी के नए रेगुलेशन को समाप्त करने और उस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अदालत अनुमति दे, तो वे इससे बेहतर और संतुलित रेगुलेशन तैयार कर सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह एक संवैधानिक मामला है। हालांकि, कोर्ट ने रेगुलेशन में प्रयुक्त भाषा को लेकर चिंता जताई।
चीफ जस्टिस ने कहा कि रेगुलेशन में इस्तेमाल किए गए शब्दों से यह संकेत मिलता है कि इसके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि अदालत समाज में एक निष्पक्ष और समावेशी माहौल बनाने पर विचार कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सेक्शन 2ई पहले से मौजूद है, तो फिर 2सी की प्रासंगिकता कैसे बनती है?

