उत्तराखंड में परिवार/कुटुंब रजिस्टर से जुड़ी अनियमितताओं को लेकर राज्य सरकार ने अब बेहद सख्त और निर्णायक रुख अपना लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट कर दिया है कि इस महत्वपूर्ण अभिलेख व्यवस्था में किसी भी तरह की लापरवाही, गड़बड़ी या फर्जीवाड़ा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी क्रम में सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेशभर के परिवार रजिस्टरों की वर्ष 2003 से जनवरी 2026 तक व्यापक और गहन जांच कराने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि जांच के दौरान यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन, गलत प्रविष्टि या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल सामने आता है, तो संबंधित व्यक्तियों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कठोर विभागीय और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। दरअसल, परिवार या कुटुंब रजिस्टर ग्रामीण व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। इन्हीं रजिस्टरों के आधार पर नागरिकों को निवास, परिवार पहचान, सामाजिक योजनाओं और विभिन्न सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलता है। ऐसे में इन रजिस्टरों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर करती है, बल्कि इससे सामाजिक और जन-सांख्यिकीय संतुलन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। पंचायती राज विभाग के आंकड़े भी इस चिंता को मजबूती देते हैं। बीते कुछ वर्षों में परिवार रजिस्टर से संबंधित सेवाओं के लिए बड़ी संख्या में आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें से हजारों आवेदन नियमों के उल्लंघन, अपूर्ण दस्तावेजों और संदिग्ध तथ्यों के कारण निरस्त किए गए। सरकार का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में निरस्तीकरण इस बात का संकेत है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामियां मौजूद हैं, जिनकी अनदेखी अब संभव नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री ने यह निर्देश दिए हैं कि परिवार रजिस्टरों की जांच का दायरा केवल हालिया वर्षों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि वर्ष 2003 से अब तक की सभी प्रविष्टियों की समीक्षा की जाए। सरकार का तर्क है कि यदि केवल वर्तमान या हाल के मामलों की जांच की गई, तो वर्षों से चली आ रही अनियमितताएं सामने नहीं आ पाएंगी। पिछले दो दशकों में हुई संभावित गड़बड़ियों की पहचान कर उन्हें उजागर करना और दुरुस्त करना ही इस कवायद का मूल उद्देश्य है। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक पुरानी गलतियों को सामने लाकर उन पर कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक व्यवस्था में स्थायी सुधार संभव नहीं है। जांच प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए सरकार ने अभिलेखों की सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के सभी जिलों में उपलब्ध परिवार या कुटुंब रजिस्टरों की प्रतियां तत्काल संबंधित जिलाधिकारियों के पास सुरक्षित रखी जाएं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच के दौरान या उससे पहले अभिलेखों में किसी भी तरह की छेड़छाड़ की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाए। सरकार का मानना है कि जब तक रिकॉर्ड पूरी तरह सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक निष्पक्ष जांच संभव नहीं है। इसके साथ ही यह भी तय किया गया है कि परिवार रजिस्टरों की गहन जांच सीडीओ और एडीएम स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों से कराई जाएगी, ताकि प्रक्रिया पर किसी प्रकार का स्थानीय दबाव या प्रभाव न पड़ सके और जांच पूरी तरह प्रभावी ढंग से संपन्न हो। मुख्यमंत्री ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज कराने के मामलों को लेकर भी बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति गलत या फर्जी दस्तावेजों के सहारे परिवार रजिस्टर में अपना या किसी अन्य का नाम दर्ज कराता पाया गया, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कड़ी विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इतना ही नहीं, यदि जांच के दौरान यह सामने आता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने लापरवाही बरती है या जानबूझकर मिलीभगत की है, तो उस पर भी कार्रवाई से पीछे नहीं हटा जाएगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि कानून और नियम सभी के लिए समान हैं, चाहे वह आम नागरिक हो या सरकारी कर्मचारी।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि परिवार रजिस्टर में नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया को अब और अधिक सख्त तथा पारदर्शी बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि परिवार रजिस्टर का पंजीकरण पंचायत राज (कुटुंब रजिस्टरों का अनुरक्षण) नियमावली, 1970 के तहत किया जाता है। इन नियमों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार का नाम परिवार रजिस्टर में दर्ज होना अनिवार्य है। हालांकि, समय के साथ इस प्रक्रिया में कई स्तरों पर ढिलाई और अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई हैं। अब सरकार का उद्देश्य है कि वर्तमान प्रविष्टियों का शुद्धिकरण किया जाए और भविष्य में नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया पूरी तरह नियमबद्ध, सख्त और पारदर्शी हो। नियमों के अनुसार परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज करने का अधिकार एडीओ पंचायत के पास होता है, जबकि किसी भी प्रकार की आपत्ति या विवाद की स्थिति में अपील एसडीम स्तर पर की जा सकती है। इसके अलावा, यह सेवाएं “अपणी सरकार” पोर्टल के माध्यम से भी उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि नागरिकों को कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें और पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन व ट्रैक करने योग्य हो सके। सरकार का मानना है कि डिजिटल माध्यमों के अधिक उपयोग से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि अनियमितताओं की गुंजाइश भी काफी हद तक कम होगी।
परिवार रजिस्टर में गड़बड़ी आने के बाद धामी सरकार ने लिया फैसला—
मुख्यमंत्री ने परिवार रजिस्टर के मामलों में जन-सांख्यिकीय संतुलन के मुद्दे पर भी गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में सीमावर्ती और मैदानी जिलों के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में अनधिकृत बसावट के आधार पर परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज होने की शिकायतें सामने आई हैं। इससे स्थानीय जनसंख्या संरचना और सामाजिक संतुलन प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। इसी कारण सरकार ने यह निर्णय लिया है कि प्रदेश के सभी जिलों में समान रूप से जांच कराई जाएगी, ताकि किसी भी क्षेत्र के साथ भेदभाव का आरोप न लगे और जांच प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे। सरकार ने यह भी संकेत दिए हैं कि भविष्य में परिवार रजिस्टर से संबंधित एक स्पष्ट और व्यापक नीति तैयार की जाएगी, जिसे कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इस नीति का उद्देश्य न केवल वर्तमान व्यवस्था को मजबूत करना होगा, बल्कि भविष्य में उत्पन्न होने वाली समस्याओं को भी पहले ही रोकना होगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि परिवार रजिस्टर केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की पहचान और संरचना का आधार हैं। इसलिए इनकी शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उत्तराखंड सरकार का यह कदम परिवार रजिस्टर व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसे को बहाल करने की दिशा में एक बड़ा और अहम प्रयास माना जा रहा है। सरकार ने साफ कर दिया है कि चाहे मामला कितना भी पुराना क्यों न हो, यदि उसमें गड़बड़ी पाई जाती है तो उस पर कार्रवाई अवश्य होगी। यह संदेश न केवल आम जनता के लिए है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर के लिए भी है कि अब नियमों से समझौता नहीं किया जाएगा और व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कठोर फैसले लेने से सरकार पीछे नहीं हटेगी।
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