6 फरवरी। यह तारीख हर साल देश के संगीतप्रेमियों के दिल में एक गहरी खामोशी उतार देती है। 6 फरवरी 2022 को स्वर कोकिला लता मंगेशकर का निधन हुआ था और उसी दिन भारतीय संगीत ने अपनी सबसे उज्ज्वल, सबसे पवित्र और सबसे भरोसेमंद आवाज़ को खो दिया। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें सिर्फ याद नहीं कर रहा, बल्कि उनके सुरों में खुद को फिर से तलाश रहा है। रेडियो से लेकर मोबाइल फोन तक, मंदिरों से लेकर घरों के आंगन तक, हर जगह वही आवाज गूंजती महसूस होती है जिसने दशकों तक भारत की भावनाओं को स्वर दिया। लता मंगेशकर केवल एक गायिका नहीं थीं। वे उस भारत की आवाज थीं, जो प्रेम में भी विश्वास करता है, पीड़ा में भी गरिमा रखता है और देशभक्ति में भी विनम्र रहता है। उनके गाए गीत किसी एक दौर या पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे। “ऐ मेरे वतन के लोगों” में राष्ट्र का आत्मसम्मान झलका, “लग जा गले” में प्रेम की शुद्धता बहती दिखी और “तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा” में जीवन की अधूरी सच्चाई। यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा बन जाती है। लता जी का सफर आसान नहीं था। इंदौर से शुरू हुई उनकी संगीत यात्रा मुंबई की संघर्ष भरी गलियों से होकर विश्व मंच तक पहुंची। उन्होंने हजारों गीत गाए, लेकिन हर गीत में वही सादगी, वही अनुशासन और वही आत्मा बनी रही। उन्होंने कभी शोर नहीं मचाया, लेकिन जब गाया तो पूरी दुनिया ठहर गई। उनकी आवाज में तकनीक से ज्यादा तपस्या थी और सुरों से ज्यादा संवेदना। बुजुर्गों के लिए वे स्मृतियों की साथी हैं, युवाओं के लिए शुद्ध संगीत की पहचान और बच्चों के लिए सुरों की पहली सीढ़ी। शायद यही कारण है कि लता मंगेशकर को याद करते समय आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन दिल में एक सुकून भी उतर आता है। वे चली गईं, लेकिन उनका संगीत हमारे जीवन का हिस्सा बनकर हमेशा के लिए ठहर गया है।
लता मंगेशकर का जाना अंत नहीं निरंतरता है–
लता मंगेशकर की पुण्यतिथि अब केवल स्मरण का दिन नहीं रह गई है, यह आत्ममंथन का अवसर भी बन चुकी है। आज के तेज, शोरगुल भरे और डिजिटल संगीत के दौर में जब आवाजों को तकनीक से संवारा जाता है, तब लता जी का स्वर हमें यह याद दिलाता है कि असली ताकत सादगी और साधना में होती है। यही वजह है कि नई पीढ़ी भी आज उनके गीतों की ओर लौट रही है और उन्हें फिर से खोज रही है। कुछ वर्षों में यह साफ देखा गया है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और म्यूजिक ऐप्स पर लता मंगेशकर के गीतों की लोकप्रियता लगातार बनी हुई है। उनकी पुण्यतिथि पर रेडियो चैनलों ने विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए, संगीत सभाओं में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई और देश-विदेश में बसे भारतीयों ने सोशल मीडिया के जरिए उन्हें नमन किया। यह दिखाता है कि लता जी सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक संगीत धरोहर का हिस्सा हैं। संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि लता मंगेशकर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने गीत को मनोरंजन से ऊपर उठाकर भावना और संस्कार का माध्यम बनाया। उन्होंने कभी गीत को हल्केपन में नहीं लिया। हर शब्द, हर सुर उनके लिए जिम्मेदारी था। शायद यही वजह है कि उनके गाए देशभक्ति गीत आज भी राष्ट्रीय आयोजनों में आत्मा को झकझोर देते हैं और उनके गाए भजन आज भी लोगों को भीतर तक छू जाते हैं।
पुण्यतिथि के अवसर पर कई संगीत संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या आज हम उस विरासत को संभाल पा रहे हैं, जो लता मंगेशकर जैसी महान कलाकारों ने छोड़ी है। यह सवाल सिर्फ संगीत का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का भी है। लता जी का संगीत हमें यह सिखाता है कि कला में अनुशासन, विनम्रता और निरंतर साधना कितनी जरूरी है। लता मंगेशकर का जाना एक युग का अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी निरंतरता की शुरुआत थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहेगी। उनके स्वर आज भी सुबह की प्रार्थना में, शाम की तन्हाई में और राष्ट्र के गर्व के क्षणों में गूंजते हैं। वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत हमारी सांसों के साथ चलते हैं। शायद यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी जीत होती है। जब उसका अस्तित्व समय से बड़ा हो जाए। लता मंगेशकर ने यही किया। उनकी पुण्यतिथि हमें यह याद दिलाती है कि कुछ आवाजें कभी खामोश नहीं होतीं, वे सिर्फ स्मृतियों में और गहरी उतर जाती हैं।
जब लता मंगेशकर की आवाज घर का हिस्सा होती थी–
जब लता मंगेशकर की आवाज घर का हिस्सा होती थी
एक समय था जब भारत के हर घर में लता मंगेशकर की आवाज किसी सदस्य की तरह मौजूद रहती थी। सुबह रेडियो से आती प्रार्थना हो, दोपहर में बजता कोई फिल्मी गीत या फिर रात को दूरदर्शन पर कोई कार्यक्रम, लता जी का स्वर बिना दस्तक दिए घर में दाखिल हो जाता था। न कोई शोर, न कोई दिखावा, बस एक ऐसी आवाज़ जो सीधे दिल में उतर जाती थी। आज जब उनकी पुण्यतिथि आती है, तो यही एहसास सबसे ज्यादा गहराता है कि हमने सिर्फ़ एक गायिका नहीं खोई, बल्कि अपने जीवन की एक स्थायी ध्वनि खो दी। लता मंगेशकर की खासियत यह नहीं थी कि उन्होंने कितने गीत गाए, बल्कि यह थी कि हर गीत को उन्होंने अपना बना लिया। वे प्रेम गीत गाती थीं तो उसमें शालीनता होती थी, दर्द गाती थीं तो उसमें गरिमा होती थी और देशभक्ति गाती थीं तो उसमें विनम्र गर्व झलकता था। उनकी आवाज कभी आक्रामक नहीं हुई, फिर भी वह सबसे प्रभावशाली रही। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज़ पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी बन गई। आज के दौर में जब संगीत तेजी से बदल रहा है, तब लता जी की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। नई पीढ़ी, जिसने उन्हें मंच पर कभी नहीं देखा, आज भी उनके गीत सुनती है। यह सिर्फ नॉस्टेल्जिया नहीं है, बल्कि उस शुद्धता की तलाश है, जो आज के शोर में कहीं खोती जा रही है। उनके गीत सुनते हुए लगता है कि भावनाओं को व्यक्त करने के लिए ऊंची आवाज़ या भारी संगीत की जरूरत नहीं होती, बस सच्चाई चाहिए। उनकी पुण्यतिथि पर देशभर में होने वाली श्रद्धांजलियां यह साबित करती हैं कि लता मंगेशकर किसी एक भाषा, क्षेत्र या वर्ग की नहीं थीं। वे पूरे देश की आवाज थीं। मराठी से हिंदी, बंगाली से उर्दू तक, हर भाषा में उनका स्वर एक-सा आत्मीय लगता था। उन्होंने भारत की विविधता को सुरों में पिरोया और उसे एक साझा भावनात्मक अनुभव बना दिया। आज जब हम लता जी को याद करते हैं, तो यह एहसास भी होता है कि कुछ कलाकार समय से आगे निकल जाते हैं। वे अपने दौर में नहीं रुकते, बल्कि हर नए दौर में नए अर्थ के साथ लौटते हैं। लता मंगेशकर भी ऐसी ही कलाकार हैं। उनके गीत आज भी बजते हैं, आज भी रुलाते हैं, आज भी सुकून देते हैं, और शायद आने वाली पीढ़ियों को भी देते रहेंगे। लता जी चली गईं, लेकिन उनकी आवाज हमारे जीवन से गई नहीं। वह अब भी किसी अकेले पल में सहारा बन जाती है, किसी खुशी के क्षण में मिठास घोल देती है और किसी राष्ट्रीय अवसर पर गर्व से सीना चौड़ा कर देती है। शायद यही अमरता है। जब इंसान चला जाए, लेकिन उसकी उपस्थिति कभी खत्म न हो।

