उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि लोगों की पहचान, सम्मान और पीढ़ियों की मेहनत का प्रतीक होती है। यहां की हर इंच भूमि से किसी न किसी परिवार की आजीविका, भावनाएं और भविष्य जुड़ा है। लेकिन वर्षों से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भूमि से जुड़े विवाद आम लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बने हुए हैं। कहीं सीमांकन को लेकर झगड़ा है, तो कहीं कब्जे, पैतृक बंटवारे, चकबंदी या सरकारी अभिलेखों में त्रुटियों के कारण लोग सालों से तहसील, थाना और अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा भूमि विवादों के त्वरित निस्तारण के लिए एक माह का विशेष अभियान चलाने का फैसला उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है, जो लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे थे। उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जमीन ही जीवन का आधार है। खेती-किसानी, मकान, पशुपालन और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसी पर टिका होता है। कई परिवार ऐसे हैं जिनकी पूरी जिंदगी की कमाई एक छोटे से भूखंड में लगी हुई है। लेकिन जब उसी जमीन पर विवाद खड़ा हो जाता है, तो न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि परिवारों के बीच तनाव, गांवों में आपसी रंजिश और सामाजिक सौहार्द भी प्रभावित होता है। छोटे-छोटे विवाद कई बार बड़े झगड़ों का रूप ले लेते हैं और मामला पुलिस तथा अदालत तक पहुंच जाता है। इससे आम आदमी का समय, पैसा और मानसिक शांति तीनों छिन जाते हैं। मुख्यमंत्री धामी ने इस सच्चाई को गंभीरता से समझते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि भूमि विवादों को अब टालने या लटकाने की नीति नहीं चलेगी। उन्होंने मुख्य सचिव आनंद बर्धन और पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ को निर्देश दिए हैं कि राज्य के सभी जनपदों में लंबित भूमि विवादों की पहचान कर एक माह के भीतर उनका निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। मुख्यमंत्री का यह निर्देश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि उन पीड़ित लोगों के दर्द को समझने का प्रयास है, जो वर्षों से अपने ही हक की जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस विशेष अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने इसका लक्ष्य बेहद स्पष्ट रखा है, अभियान के अंत तक भूमि विवादों से जुड़े लंबित मामलों को शून्य स्तर तक लाना। यह लक्ष्य बताता है कि सरकार आधे-अधूरे समाधान से संतुष्ट नहीं होना चाहती, बल्कि जमीनी स्तर पर वास्तविक राहत देना चाहती है। मुख्यमंत्री ने यह भी साफ कर दिया है कि अभियान के दौरान किसी भी तरह की लापरवाही या ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसका सीधा संदेश अधिकारियों तक जाता है कि आम जनता की समस्या को प्राथमिकता पर लिया जाए। भूमि विवादों का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे कानून-व्यवस्था भी प्रभावित होती है। कई बार जमीन के झगड़े हिंसा, मारपीट और लंबे कानूनी विवाद का कारण बन जाते हैं। मुख्यमंत्री ने इस पहलू को ध्यान में रखते हुए प्रशासन और पुलिस के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया है। तहसील स्तर पर उप जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समितियों के गठन का निर्देश इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इन समितियों में पुलिस और चकबंदी विभाग के अधिकारियों को शामिल करने से यह सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक, राजस्व और पुलिस तीनों स्तर पर एक साथ काम हो और विवादों का समाधान तेजी से निकले। उत्तराखंड के दूरस्थ पर्वतीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह फैसला और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पहाड़ी क्षेत्रों में तहसील और जिला मुख्यालय तक पहुंचना आसान नहीं होता। कई बुजुर्ग, महिलाएं और किसान केवल एक सुनवाई के लिए लंबी दूरी तय करते हैं। कई बार खराब मौसम, सड़कें बंद होने और संसाधनों की कमी के कारण उनकी सुनवाई टल जाती है। ऐसे में यदि विवादों का निस्तारण स्थानीय स्तर पर, तय समय-सीमा में हो जाए, तो यह आम लोगों के लिए बड़ी राहत साबित होगा। इस अभियान की नियमित समीक्षा का जिम्मा मुख्य सचिव को दिया जाना भी सरकार की गंभीरता को दर्शाता है। साप्ताहिक समीक्षा से यह सुनिश्चित होगा कि कहीं कोई मामला अनावश्यक रूप से लंबित न रहे और जरूरत पड़ने पर तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। इससे न केवल अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, बल्कि आम जनता में भी यह विश्वास पैदा होगा कि उनकी शिकायतों को सुना जा रहा है। भूमि विवादों से परेशान लोगों के लिए यह फैसला इसलिए भी भावनात्मक महत्व रखता है क्योंकि कई मामलों में विवाद पीढ़ियों से चला आ रहा होता है। पिता के बाद बेटा और फिर पोता उसी जमीन के लिए लड़ता रहता है। ऐसे मामलों में केवल कानूनी समाधान ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण की भी जरूरत होती है। मुख्यमंत्री द्वारा संवेदनशील मामलों पर विशेष ध्यान देने का निर्देश इसी सोच को दर्शाता है। सरकार यह समझती है कि हर फाइल के पीछे किसी परिवार की कहानी, उसकी उम्मीदें और उसका संघर्ष छिपा होता है। धामी सरकार का यह कदम शासन-प्रशासन और जनता के बीच विश्वास को मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है। जब आम आदमी को यह भरोसा मिलता है कि सरकार उसकी समस्या को गंभीरता से ले रही है और समयबद्ध समाधान दे रही है, तो लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होती हैं। भूमि विवादों का त्वरित निस्तारण न केवल लोगों को मानसिक और आर्थिक राहत देगा, बल्कि राज्य में शांति, सामाजिक सौहार्द और विकास के माहौल को भी बढ़ावा देगा। भूमि विवादों के त्वरित निस्तारण के लिए शुरू किया गया यह विशेष अभियान उत्तराखंड के हजारों परिवारों के लिए उम्मीद, राहत और न्याय का संदेश लेकर आया है। यह फैसला उन लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने जैसा है, जो सालों से अपनी जमीन और अपने हक के लिए भटक रहे थे। अगर यह अभियान अपने तय लक्ष्यों के अनुरूप सफल होता है, तो यह न केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि होगी, बल्कि आम जनता के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने वाला कदम साबित होगा।
देहरादून समेत कई जिलों में भूमि विवादों के मामलों में लगातार हो रही बढ़ोतरी दर्ज–
हाल के वर्षों में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून समेत राज्य के कई जिलों में भूमि विवादों के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। शहरीकरण, तेजी से बढ़ते रियल एस्टेट कारोबार, आबादी के दबाव और भूमि के बढ़ते दामों ने जमीन से जुड़े विवादों को और जटिल बना दिया है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, नैनीताल और पौड़ी जैसे जिलों में भूमि विवाद अब आम लोगों की सबसे बड़ी समस्याओं में शामिल हो गए हैं। देहरादून में बाहरी निवेश और तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों के कारण जमीन की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके चलते सीमांकन, कब्जे, फर्जी दस्तावेज, बैनामा विवाद और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। कई इलाकों में पुराने राजस्व अभिलेखों और मौजूदा रिकॉर्ड में अंतर होने से विवाद और गहरे हो गए हैं। स्थिति यह है कि छोटी-सी जमीन को लेकर परिवारों और पड़ोसियों के बीच वर्षों तक तनातनी बनी रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी भूमि विवाद किसी न किसी रूप में लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं। पैतृक जमीन का बंटवारा, चकबंदी से जुड़ी विसंगतियां और सीमांकन की समस्याएं आम हैं। कई मामलों में पीढ़ियों से जमीन पर खेती कर रहे लोग अचानक खुद को विवादों में घिरा हुआ पाते हैं। इससे न सिर्फ उनकी आजीविका प्रभावित होती है, बल्कि मानसिक तनाव और सामाजिक तनाव भी बढ़ता है।
भूमि विवादों का सीधा असर कानून-व्यवस्था पर भी देखने को मिल रहा है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, कई आपराधिक घटनाओं की जड़ में जमीन से जुड़ा विवाद ही पाया गया है। मारपीट, धमकी, आपसी रंजिश और लंबे कानूनी मुकदमे आम हो गए हैं। इससे पुलिस और प्रशासन पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ा है। अदालतों और तहसीलों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे आम आदमी को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है। इन हालात को देखते हुए राज्य सरकार ने भूमि विवादों को गंभीर चुनौती के रूप में लेना शुरू किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर प्रशासन को साफ संदेश दिया गया है कि भूमि से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया जाए। सरकार का मानना है कि जब तक जमीन के विवादों का समाधान नहीं होगा, तब तक आम लोगों की बड़ी समस्याएं बनी रहेंगी और विकास कार्यों पर भी असर पड़ेगा। प्रशासनिक स्तर पर यह भी माना जा रहा है कि भूमि विवादों की बढ़ती संख्या के पीछे जागरूकता की कमी और जटिल प्रक्रियाएं भी एक कारण हैं। कई लोग नियम-कानूनों की पूरी जानकारी के अभाव में गलत फैसले कर बैठते हैं, जिसका खामियाजा उन्हें वर्षों तक भुगतना पड़ता है। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि विवादों का समाधान केवल कागजी नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर हो, ताकि लोगों को वास्तविक राहत मिल सके। देहरादून समेत राज्य के कई जिलों में बढ़ते भूमि विवाद उत्तराखंड के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। सरकार और प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि इन मामलों का समयबद्ध, पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से निस्तारण किया जाए। अगर ऐसा होता है, तो इससे न सिर्फ हजारों परिवारों को राहत मिलेगी, बल्कि राज्य में सामाजिक शांति और विकास का रास्ता भी और मजबूत होगा।

