रविवार को संसद में पेश होने जा रहा केंद्रीय बजट 2026 सरकार के लिए एक बड़े इम्तिहान से कम नहीं है। एक तरफ वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का दबाव है, तो दूसरी ओर देश के भीतर महंगाई, रोजगार और आय को लेकर आम लोगों की बढ़ती चिंताएं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जब 1 फरवरी को सुबह 11 बजे संसद में बजट भाषण शुरू करेंगी, तो उनकी हर घोषणा पर देश की निगाहें टिकी होंगी। यह बजट न सिर्फ वित्तीय वर्ष 2026-27 की दिशा तय करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि सरकार आर्थिक सुस्ती के दौर में आम आदमी, मध्यम वर्ग, किसान, महिला और युवाओं को कितनी राहत दे पाती है। यह पहला मौका है जब 2017 में बजट की तारीख बदले जाने के बाद रविवार को बजट पेश किया जा रहा है। ऐसे में यह दिन प्रतीकात्मक रूप से भी खास बन गया है। आमतौर पर छुट्टी का दिन माने जाने वाले रविवार को इस बार देश की आर्थिक सेहत का लेखा-जोखा खुलेगा। बाजार से लेकर घरों की रसोई तक, बजट को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। सवाल एक ही है, क्या इस बार बजट महंगाई के बोझ से राहत देगा या फिर लोगों को और संयम बरतने की सलाह मिलेगी। वर्ष 2026-27 का बजट ऐसे समय में पेश किया जा रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर हालात पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए शुल्क, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनावों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। सरकार एक के बाद एक व्यापार समझौतों के जरिए नए बाजार खोलने की कोशिश कर रही है। हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते को इसी कड़ी में देखा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे समझौतों का फायदा तुरंत नहीं दिखता। नए बाजारों में मांग तैयार होने और समझौतों के पूरी तरह लागू होने में समय लगता है। ऐसे में अल्पकालिक चुनौतियां अभी बनी हुई हैं।

बजट में मिडिल क्लास की सबसे बड़ी उम्मीदें—
इस बजट से सबसे ज्यादा उम्मीदें मध्यम वर्ग को हैं। पिछले वित्त वर्ष के बजट में आयकर में दी गई राहत ने करोड़ों करदाताओं को सुकून दिया था। 12 लाख रुपये तक की आय पर टैक्स में कटौती और मानक कटौती के बाद 12.75 लाख रुपये तक की कर-मुक्त सीमा ने सरकार को मिडिल क्लास का हितैषी साबित किया था। अब सवाल यह है कि क्या इस बार भी टैक्स स्लैब में और बदलाव होंगे। बढ़ती महंगाई के बीच मिडिल क्लास की क्रय शक्ति दबाव में है। घर का किराया, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और ईएमआई, हर मोर्चे पर खर्च बढ़ा है। ऐसे में टैक्स में थोड़ी सी भी राहत सीधे लोगों की जेब पर असर डाल सकती है। आम आदमी की नजर सिर्फ टैक्स पर ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों पर भी है। क्या इस बजट में रसोई गैस, खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों को काबू में रखने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे। महिलाओं के लिए उज्ज्वला योजना जैसे कार्यक्रमों के विस्तार और सब्सिडी को लेकर भी उम्मीदें हैं। वहीं, घर खरीदने का सपना देख रहे लोगों को होम लोन पर ब्याज छूट बढ़ने की आस है। अगर ऐसा होता है, तो रियल एस्टेट सेक्टर को भी रफ्तार मिल सकती है, जो रोजगार सृजन के लिहाज से अहम माना जाता है।

किसान, महिला और युवाओं की परीक्षा–
किसानों के लिए यह बजट बेहद अहम है। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि आय में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पा रही। पीएम-किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाने, खाद-बीज पर सब्सिडी जारी रखने और सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करने की मांग लंबे समय से उठ रही है। इसके साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर स्पष्ट और भरोसेमंद नीति की उम्मीद भी किसान कर रहे हैं। महिलाओं के लिए बजट से जुड़े सवाल अलग हैं। क्या महिला उद्यमियों के लिए सस्ते लोन की व्यवस्था होगी। क्या कामकाजी महिलाओं को टैक्स में अतिरिक्त राहत मिलेगी। स्वयं सहायता समूहों और महिला स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए क्या नई योजनाएं आएंगी। वहीं युवाओं की नजर रोजगार पर टिकी है। सरकारी और निजी क्षेत्र में नौकरियों के अवसर, स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग, स्किल डेवलपमेंट और शिक्षा ऋण पर ब्याज दर में राहत, ये सभी मुद्दे युवाओं के लिए निर्णायक हैं। सरकार का इस बार फोकस ‘मेक इन इंडिया’ को नई गति देने पर हो सकता है। घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना, आयात पर निर्भरता कम करना और निर्यात को बढ़ावा देना मौजूदा परिस्थितियों में जरूरी माना जा रहा है। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मजबूत करने के लिए एक बड़े रोडमैप की घोषणा की संभावना है। चर्चा है कि सरकार विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक बैंकों को वैश्विक टॉप-20 बैंकों में शामिल करने की दिशा में ठोस योजना पेश कर सकती है। इसमें ऑपरेशनल दक्षता, बेहतर कॉर्पोरेट गवर्नेंस और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सर्वोत्तम प्रथाओं पर जोर दिया जा सकता है।

केंद्रीय बजट का संवैधानिक महत्व–
केंद्रीय बजट सिर्फ घोषणाओं का दस्तावेज नहीं होता। यह संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत संसद के दोनों सदनों के सामने पेश किया जाता है। इसमें सरकार की अनुमानित आय और खर्च का पूरा ब्योरा होता है। इसके जरिए सरकार अपनी नीतियों, प्राथमिकताओं और विकास के विजन को स्पष्ट करती है। बजट के बाद ही यह तय होता है कि अगले एक साल में किन क्षेत्रों को ज्यादा संसाधन मिलेंगे और किन योजनाओं पर खास जोर रहेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नाम पहले ही कई रिकॉर्ड दर्ज हैं। सबसे लगातार बजट पेश करने और सबसे लंबी बजट स्पीच देने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। लेकिन 2026 का बजट उनके लिए इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यह आर्थिक सुस्ती और महंगाई के दौर में पेश हो रहा है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए विकास और राहत के बीच संतुलन साधेंगी। रविवार को पेश होने वाला यह बजट क्या भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति दे पाएगा। अगर टैक्स में राहत, सरकारी खर्च में समझदारी और विकास परियोजनाओं पर जोर दिया गया, तो इसका सीधा असर उपभोग और निवेश पर पड़ेगा। इससे बाजार में मांग बढ़ सकती है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। रविवार को होने वाला यह बजट सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि पूरे देश का इम्तिहान है। उम्मीदें बेहिसाब हैं, चुनौतियां भी कम नहीं। अब सबकी निगाहें संसद पर टिकी हैं, जहां से यह तय होगा कि आने वाला साल आम आदमी के लिए राहत लेकर आएगा या फिर इंतजार की सूची में एक और साल जुड़ जाएगा।

