अंकिता भंडारी मर्डर केस : सीएम धामी का सीबीआई फैसला, विपक्ष का नहीं बना भरोसा - Daily Lok Manch PM Modi USA Visit New York Yoga Day
February 5, 2026
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अंकिता भंडारी मर्डर केस : सीएम धामी का सीबीआई फैसला, विपक्ष का नहीं बना भरोसा




तीन वर्ष पहले पौड़ी जिले में अंकिता भंडारी की निर्मम हत्या का मामला एक बार फिर उत्तराखंड की सियासत, सामाजिक चेतना और प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। अंकिता भंडारी की मौत ने उस समय जिस तरह राज्य को झकझोरा था, वैसी ही हलचल अब दोबारा महसूस की जा रही है। समय बीतने के साथ यह प्रकरण भले ही अदालत की प्रक्रिया में आगे बढ़ा हो, लेकिन न्याय को लेकर उठते सवाल और भावनात्मक आक्रोश पूरी तरह शांत नहीं हो सका। अब जब यह मुद्दा फिर से जनआंदोलन और राजनीतिक बहस का विषय बना है, तो इसका असर राजधानी से लेकर गांवों तक साफ नजर आने लगा है। जनवरी के पहले सप्ताह में देहरादून का घंटाघर इलाका एक बार फिर विरोध का प्रतीक बन गया। अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़ी पार्टियों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला। रैली के दौरान हाथों में तख्तियां, नारों की गूंज और न्याय की मांग ने माहौल को भावुक बना दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि इतने लंबे समय बाद भी कई अहम सवालों के जवाब नहीं मिल पाए हैं। विशेष रूप से कथित प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका और पूरे घटनाक्रम में जिम्मेदारी तय करने को लेकर संदेह लगातार बना हुआ है। बढ़ते जनदबाव के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दिल्ली दौरे से लौटते ही मीडिया के सामने आए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार इस प्रकरण को गंभीरता से ले रही है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। इसी क्रम में केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने की संस्तुति की घोषणा की गई। इस फैसले को सरकार ने पारदर्शिता और निष्पक्षता की दिशा में बड़ा कदम बताया। मुख्यमंत्री ने यह भी दोहराया कि राज्य की बेटी को न्याय दिलाना उनकी प्राथमिकता है और प्रक्रिया में किसी तरह की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। अगले ही दिन मुख्यमंत्री ने दिवंगत अंकिता भंडारी के माता-पिता से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की। इस भेंट को मानवीय पहल के रूप में देखा गया, जहां परिवार के दर्द को समझने और भरोसा दिलाने की कोशिश की गई। सरकार की ओर से यह संदेश दिया गया कि जांच एजेंसी के जरिए पूरे मामले की गहराई से पड़ताल होगी। हालांकि, यह पहल भी विरोध की आवाजों को पूरी तरह थाम नहीं सकी। विपक्षी दलों का तर्क रहा कि केवल संस्तुति भर से सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि जवाबदेही तय करना और समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ कई सामाजिक मंच भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो गए हैं। उनका मानना है कि यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ा है। आंदोलनों के दौरान बार-बार यह बात उठाई गई कि यदि शुरुआत में ही निष्पक्ष और कठोर कदम उठाए गए होते, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। इसी सोच के चलते विरोध का दायरा लगातार बढ़ता गया। चार जनवरी को हुए प्रदर्शन के बाद विपक्षी खेमे ने साफ संकेत दे दिए थे कि आंदोलन यहीं थमने वाला नहीं है। कई बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं के बाद रविवार, 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का ऐलान किया गया। इस आह्वान में विभिन्न दलों के अलावा छोटे राजनीतिक समूह, छात्र संगठन और नागरिक मंच भी शामिल हो गए। बंद के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि जांच प्रक्रिया पर लगातार निगरानी बनी रहे और किसी भी स्तर पर समझौते की गुंजाइश न रहे। राज्य में इस तरह का बंद लंबे अंतराल के बाद देखने को मिल रहा है। प्रशासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए हैं। संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती, यातायात व्यवस्था को लेकर दिशा-निर्देश और आवश्यक सेवाओं को सुचारु रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं, सरकार की ओर से यह अपील भी की गई है कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे और आम लोगों को परेशानी न हो। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या न्याय की प्रक्रिया केवल कानूनी दायरे में सिमट कर रह जानी चाहिए, या फिर समाज की संवेदनाओं को भी उतनी ही अहमियत मिलनी चाहिए। अंकिता भंडारी का नाम अब केवल एक व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुका है, जो सत्ता, व्यवस्था और जवाबदेही के बीच संतुलन की मांग करता है। यही वजह है कि तीन साल बाद भी यह प्रकरण लोगों की भावनाओं को छू रहा है। विपक्ष इस मुद्दे को सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में देख रहा है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन पूरी तरह निष्पक्ष होता, तो इतने लंबे समय तक आंदोलन की जरूरत ही नहीं पड़ती। दूसरी ओर, सत्तापक्ष का तर्क है कि जांच को प्रभावित किए बिना उसे सही दिशा में ले जाना जरूरी है और राजनीतिक दबाव से प्रक्रिया कमजोर हो सकती है। इन दोनों पक्षों के बीच चल रही बयानबाजी ने माहौल को और गर्म कर दिया है। मीडिया और सामाजिक मंचों पर भी इस मामले को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। देशभर में यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रभाव और रसूख के आगे न्याय कमजोर पड़ता है, या फिर अंततः सच्चाई सामने आती है। यही कारण है कि यह प्रकरण अब केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गया है। आने वाले दिनों में केंद्रीय जांच एजेंसी की भूमिका पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। जांच की दिशा, निष्कर्ष और आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि जनता का भरोसा किस हद तक बहाल हो पाता है। फिलहाल इतना तय है कि अंकिता भंडारी का मामला एक बार फिर राज्य की राजनीति, समाज और प्रशासन के लिए परीक्षा बन चुका है, जहां हर कदम पर पारदर्शिता और संवेदनशीलता की अपेक्षा की जा रही है।




धामी सरकार ने राजकीय नर्सिंग कॉलेज डोभ पौड़ी का नाम अंकिता भंडारी रखा—



मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पौड़ी जनपद स्थित राजकीय नर्सिंग कॉलेज डोभ (श्रीकोट) का नाम अब ‘स्वर्गीय अंकिता भंडारी राजकीय नर्सिंग कॉलेज डोभ (श्रीकोट), पौड़ी’ रखा गया है। मुख्यमंत्री के निर्देश के तुरंत बाद इस फैसले पर अमल करते हुए शासनादेश जारी कर दिया गया है। चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार द्वारा गुरुवार को इस संबंध में औपचारिक आदेश जारी किया गया, जिससे यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।
यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी की स्मृति को सम्मान देने और उसके साथ हुए अन्याय के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाने वाला कदम माना जा रहा है। तीन साल बाद भी अंकिता का नाम राज्य और देश की चेतना में जीवित है और न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। ऐसे में एक शैक्षणिक संस्थान का नाम उसके नाम पर किया जाना उस पीड़ा और संघर्ष को स्थायी पहचान देने जैसा है, जिसे प्रदेश कभी भुला नहीं सकता। इससे एक दिन पूर्व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वर्गीय अंकिता भंडारी के माता-पिता से मुलाकात की थी। इस दौरान मुख्यमंत्री ने परिवार के दुःख को गंभीरता से सुना और उन्हें यह भरोसा दिलाया कि सरकार हर कदम पर उनके साथ मजबूती से खड़ी है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पीड़ित परिवार द्वारा रखी गई प्रत्येक मांग पर विधि-सम्मत, निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने कहा कि अंकिता को न्याय दिलाना केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सरकार की सर्वोच्च नैतिक प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी भी स्तर पर लापरवाही या पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और पूरा मामला पूरी पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। नर्सिंग कॉलेज का नामकरण उसी भरोसे और संवेदनशीलता की कड़ी माना जा रहा है, जिसके माध्यम से सरकार यह संदेश देना चाहती है कि अंकिता केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि प्रदेश की बेटी है। राजकीय नर्सिंग कॉलेज का नाम स्वर्गीय अंकिता भंडारी के नाम पर किए जाने से न केवल पौड़ी जनपद, बल्कि पूरे उत्तराखंड में भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े इस संस्थान के माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अंकिता के नाम और उसकी कहानी से जुड़ेंगी, जो समाज को संवेदनशील, जागरूक और जिम्मेदार बनाने की दिशा में एक प्रतीकात्मक पहल मानी जा रही है। सरकार का यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब अंकिता भंडारी का मामला एक बार फिर सियासी और सामाजिक विमर्श के केंद्र में है। ऐसे में यह कदम प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर एक भावनात्मक और सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि राज्य अपनी बेटियों की स्मृति और सम्मान के साथ खड़ा है और न्याय की लड़ाई में पीछे हटने वाला नहीं है।



अंकिता हत्याकांड पर सियासी संग्राम, सीबीआई जांच को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने–




अंकिता भंडारी हत्याकांड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा सीबीआई जांच की संस्तुति किए जाने के बावजूद राज्य की राजनीति में उबाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक ओर जहां भाजपा इस फैसले को जनभावनाओं के अनुरूप बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे नाकाफी करार देते हुए सरकार की मंशा और जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मुख्यमंत्री के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि सीबीआई जांच से विपक्ष के झूठ और दुष्प्रचार का पर्दाफाश होगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने शुरुआत से ही इस मामले में गंभीरता दिखाई है और अंकिता के हत्यारों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया गया। मामले की निष्पक्ष जांच कराई गई और अब पीड़ित परिवार की भावना का सम्मान करते हुए सीबीआई जांच की संस्तुति की गई है, ताकि किसी भी प्रकार का संदेह शेष न रहे। महेंद्र भट्ट ने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि अंकिता प्रकरण पर शुरू से ही राजनीति की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने किसी दबाव में नहीं बल्कि जनभावनाओं और पीड़ित परिवार की इच्छा को देखते हुए यह फैसला लिया है। उन्होंने नर्सिंग कॉलेज का नाम स्वर्गीय अंकिता भंडारी के नाम पर किए जाने को लेकर कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों को राजनीतिक झूठ बताया और कहा कि मुख्यमंत्री की घोषणा के साथ ही शासनादेश जारी कर दिया गया था, इसके बावजूद भ्रम फैलाने का प्रयास किया गया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के नाम पर समाज को बांटने और माहौल खराब करने की कोशिशों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और संगठनों से अपील की कि इस संवेदनशील मामले पर राजनीति बंद की जाए और न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित न किया जाए। भट्ट ने अफसोस जताते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं के लिए अंकिता की मौत सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा बनकर रह गई है, जबकि न तो उन्हें पीड़ित परिवार की राय की परवाह है और न ही किसी संस्थान के नामकरण के महत्व की। दूसरी ओर उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सीबीआई जांच के आदेश को अपर्याप्त बताया है। उन्होंने कहा कि यह देवभूमि की जागरूक जनता की जीत जरूर है, लेकिन यह जीत अभी अधूरी है। गोदियाल ने सवाल उठाया कि जब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार है, तो सीबीआई की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर संदेह स्वाभाविक है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि जिन लोगों पर गंभीर आरोप लग रहे हैं, वे प्रभावशाली पदों पर बैठे हैं और सत्तारूढ़ दल से जुड़े हुए हैं। ऐसे में केवल सीबीआई जांच का आदेश जनता की आशंकाओं को दूर नहीं करता। उन्होंने कहा कि यह मामला इतना संवेदनशील और गंभीर है कि इसकी जांच हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में होनी चाहिए थी, तभी सच्चाई पूरी तरह सामने आ सकती है। गणेश गोदियाल ने यह भी आरोप लगाया कि सीबीआई जांच की संस्तुति देकर धामी सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि अतीत में इस मामले में बड़ी चूक हुई है। उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि सरकार अब अपनी गलती सुधारने का प्रयास कर रही है, लेकिन यह प्रयास अभी पर्याप्त नहीं है। उन्होंने साफ किया कि जब तक अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी का खुलासा नहीं हो जाता, जब तक बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े अधिकारियों के नाम सामने नहीं आते और उन्हें सजा नहीं मिलती, तब तक कांग्रेस का आंदोलन और संघर्ष जारी रहेगा। अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच जारी यह राजनीतिक टकराव साफ तौर पर दिखा रहा है कि मामला केवल जांच तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह राज्य की राजनीति का बड़ा केंद्र बिंदु बन चुका है, जहां हर फैसला और बयान सियासी नजरिए से तौला जा रहा है।




अंकिता भंडारी हत्याकांड का मामला पहली बार 22 सितंबर 2022 को सामने आया था–



अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। यह मामला पहली बार 22 सितंबर 2022 को सामने आया था, जब पौड़ी जिले के लक्ष्मणझूला क्षेत्र स्थित वनंतरा रिजॉर्ट से जुड़ी इस सनसनीखेज घटना ने राज्य की राजनीति और प्रशासन को झकझोर दिया था। जिलाधिकारी के आदेश पर लक्ष्मणझूला थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया और शुरुआती दबाव के बीच धामी सरकार ने 24 सितंबर 2022 को जांच के लिए विशेष जांच टीम का गठन किया था। जांच के दौरान तीन आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद कोर्ट ने तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुना दी। सरकार की ओर से इसे न्यायिक प्रक्रिया की बड़ी सफलता बताया गया, लेकिन समय बीतने के साथ यह मामला पूरी तरह शांत नहीं हो सका। हाल के दिनों में भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर और उनकी दूसरी पत्नी, एक्ट्रेस उर्मिला सनावर की कथित कॉल रिकॉर्डिंग सामने आने के बाद यह प्रकरण एक बार फिर सियासी तूफान के केंद्र में आ गया।
वायरल ऑडियो में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का जिक्र किए जाने और कथित वीआईपी गेस्ट को लेकर अंकिता की हत्या की बात सामने आने से विपक्षी कांग्रेस को बड़ा मुद्दा मिल गया। कांग्रेस ने इसे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार और भाजपा को घेरने का हथियार बना लिया। इसके बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई और सरकार पर दोबारा जांच कराने का दबाव बढ़ने लगा। बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी के माता-पिता से मुलाकात की। परिवार की भावनाओं और मांगों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने अंततः मामले की जांच सीबीआई से कराने का फैसला किया। माना जा रहा है कि केंद्रीय जांच एजेंसी के माध्यम से कथित वीआईपी गेस्ट को लेकर चल रही चर्चाओं पर से पर्दा उठ सकता है और पूरे मामले की गहराई से जांच हो सकेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि अंकिता भंडारी केस में सरकार का उद्देश्य शुरू से ही निष्पक्ष, पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से न्याय सुनिश्चित करना रहा है और आगे भी यही प्राथमिकता रहेगी। उन्होंने कहा कि जैसे ही सरकार को इस मामले की जानकारी मिली थी, बिना किसी विलंब के कार्रवाई की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला आईपीएस अधिकारी के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया गया और दोषियों को सजा दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास किए गए। मुख्यमंत्री ने दोहराया कि सरकार आगे भी न्याय प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाएगी।



अंकिता भंडारी केस में अब तक की प्रमुख घटनाएं–



18 सितंबर 2022 को वनंतरा रिजॉर्ट में कार्यरत रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो गई। परिजनों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन पुलिस की शुरुआती सुस्ती के चलते मामला सोशल मीडिया पर उछल गया, जिससे सरकार और पुलिस पर दबाव बढ़ा। 23 सितंबर 2022 को पुलिस ने अंकिता भंडारी की हत्या के आरोप में वनंतरा रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य, असिस्टेंट मैनेजर अंकित गुप्ता और मैनेजर सौरभ भास्कर को गिरफ्तार किया। 24 सितंबर 2022 को पूछताछ के दौरान यह खुलासा हुआ कि अंकिता की हत्या कर शव को चीला बैराज में धकेला गया था। दो दिन तक चले सर्च ऑपरेशन के बाद बैराज से अंकिता का शव बरामद किया गया। 30 मई 2025 को कोटद्वार स्थित एडीजे कोर्ट ने तीनों आरोपियों पुलकित आर्य, अंकित गुप्ता और सौरभ भास्कर को उम्रकैद की सजा सुनाई। 22 दिसंबर 2025 को एक्ट्रेस उर्मिला सनावर और पूर्व विधायक सुरेश राठौर की कथित बातचीत का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद मामला दोबारा गरमा गया। 7 जनवरी 2026 को अंकिता भंडारी के माता-पिता ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात कर सीबीआई जांच की मांग रखी।
9 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की औपचारिक घोषणा की। तीन साल बाद एक बार फिर अंकिता भंडारी का मामला न्याय, राजनीति और व्यवस्था की कसौटी बन गया है। अब सभी की निगाहें सीबीआई जांच पर टिकी हैं, जिससे इस बहुचर्चित हत्याकांड से जुड़े हर सवाल का जवाब सामने आने की उम्मीद की जा रही है।

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