Uttarakhand DIPR
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October 19, 2026
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राष्ट्रीय

कुल्लू दशहरा: जहां नहीं होता रावण दहन, भगवान रघुनाथ की रथयात्रा है मुख्य आकर्षण

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव 21 से 27 अक्टूबर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में होने वाले इस सात दिवसीय उत्सव में भगवान रघुनाथ की पारंपरिक रथयात्रा, 250 से अधिक पहाड़ी देवी-देवताओं का समागम, लोकनृत्य और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियां मुख्य आकर्षण होंगी। यह उत्सव हिमाचल प्रदेश की धार्मिक विरासत, लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं को करीब से देखने का अवसर प्रदान करता है।

कुल्लू का दशहरा देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। जहां अधिकांश स्थानों पर विजयादशमी के दिन दशहरा उत्सव समाप्त हो जाता है, वहीं कुल्लू में इसी दिन से उत्सव की रौनक बढ़ने लगती है। यहां इस पर्व को दशमी भी कहा जाता है और इसकी शुरुआत अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी से जुड़ी है।

दशहरे के अवसर पर ढालपुर मैदान को रंग-बिरंगे फूलों, तंबुओं और गुंबदों से सजाया जाता है। जिले के ऊझी, लग, महाराजा, रूपी, बंजार, सैंज और बाहरी सराज क्षेत्रों से देवी-देवताओं की सजी हुई पालकियां यहां पहुंचती हैं। सोने-चांदी के मोहरों, आभूषणों और रंगीन वस्त्रों से सुसज्जित पालकियों के आगमन के साथ पूरा मैदान ढोल, नगाड़े, शहनाई, धौंस और रणसिंगों की ध्वनि से गूंज उठता है। यह दृश्य मानो देवलोक के धरती पर उतर आने जैसा प्रतीत होता है।

कुल्लू दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यहां शामिल होने वाले देवी-देवता और उनसे जुड़ी परंपराएं हैं। देश के कई अन्य हिस्सों में दशहरे के दौरान रामलीला का मंचन और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है, लेकिन कुल्लू में ऐसा नहीं होता। यहां के धार्मिक अनुष्ठान अलग हैं और यह उत्सव मुख्य रूप से भगवान रघुनाथ को समर्पित है। इसकी परंपरा को भगवान राम की रावण पर विजय के उत्सव से अलग माना जाता है।

कुल्लू में दशहरा मनाने की परंपरा राजा जगत सिंह के समय से जुड़ी मानी जाती है। प्रचलित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी को भगवान रघुनाथ की प्रतिमा अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। उस अवसर पर राजा जगत सिंह ने ढालपुर मैदान में सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया था। बताया जाता है कि यह मैदान राजा जगतसुख की रानी की खेती की जमीन थी, जिसे उन्होंने दशहरा मेले के आयोजन के लिए दे दिया था।

इससे जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, राजा जगत सिंह एक बीमारी से परेशान थे। एक साधु की सलाह पर उन्होंने अयोध्या से भगवान रघुनाथ की प्रतिमा मंगवाकर कुल्लू में स्थापित करवाई। मान्यता है कि प्रतिमा की स्थापना के बाद उनके स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार हुआ। इसके बाद राजा ने अपना जीवन और राज्य भगवान रघुनाथ को समर्पित कर दिया। इसी परंपरा ने कुल्लू दशहरे को विशेष धार्मिक पहचान दी।



कुल्लू जिले को देवभूमि हिमाचल प्रदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां सदियों पुरानी देव परंपराएं आज भी लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई से जुड़ी हुई हैं। जिले के अनेक गांवों में अपने-अपने ग्राम देवता हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ये देवता केवल मंदिरों में स्थापित प्रतिमाएं नहीं, बल्कि समुदाय के जीवन का सक्रिय हिस्सा हैं। लोग देवताओं के आदेश और परंपराओं के अनुसार धार्मिक आयोजनों, मेलों और शोभायात्राओं में भाग लेते हैं। दशहरे के दौरान देवताओं के साथ उनके कारदार, पुजारी, गुर, धामी, वादक और अनुयायी भी उत्सव में शामिल होते हैं।

कुल्लू दशहरा देश की विविध लोक संस्कृतियों को प्रदर्शित करने, संरक्षित करने और आगे बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण मंच है। वर्ष 1972 में इसे अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा दिया गया था। इसके बाद से इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों के सांस्कृतिक दल भी हिस्सा लेते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय लोकनृत्य महोत्सव के तहत विदेशी कलाकार अपनी पारंपरिक कला और नृत्य प्रस्तुत करते हैं। वर्ष 2015 के महोत्सव में रूस, पुर्तगाल, किर्गिस्तान, इंडोनेशिया, श्रीलंका, नेपाल और ताइवान के कलाकारों ने भाग लिया था।

हिमाचल प्रदेश के सभी 12 जिलों के कलाकारों के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, गुजरात, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के लोक कलाकार भी इस उत्सव में प्रस्तुतियां देते रहे हैं। सप्ताहभर चलने वाले इस रंगारंग आयोजन का सांस्कृतिक कार्यक्रम लाल चंद्र प्रार्थी कला केंद्र में आयोजित किया जाता है। इससे विभिन्न क्षेत्रों की लोक कलाओं को एक मंच मिलता है और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलता है।

कुल्लू की लोक संस्कृति में घड़ाई, पंजड़ागी, दोहरी, फेती, बसहरी, लाहुली, कोरठा, चरासे-तरासे, बंधु, रक्ष और फागली सहित कई पारंपरिक नृत्य प्रचलित हैं। इनमें लालहड़ी नृत्य का विशेष महत्व रहा है। करीब तीन दशक पहले तक दशहरे के दौरान देवी-देवताओं के अनुयायी रातभर अपने तंबुओं के सामने नृत्य करते थे। पुरुष और महिलाएं लालहड़ी नृत्य में हिस्सा लेते थे और कई बार यह सिलसिला अगली सुबह तक चलता था।

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