रफ्तार की इस अंधी दौड़ में अब इंसानी जान को तरजीह मिलने लगी है। गिग वर्कर्स, खासकर डिलीवरी राइडर्स की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा और संवेदनशील फैसला लिया है। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने मंगलवार को ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी और जोमैटो जैसी प्रमुख क्विक-कॉमर्स कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक कर उन्हें सख्त डिलीवरी टाइम लिमिट हटाने की स्पष्ट सलाह दी। सरकार का साफ संदेश था। समय से पहले डिलीवरी नहीं, सुरक्षित डिलीवरी ज़रूरी है।
बैठक के बाद कंपनियों ने भरोसा दिलाया कि वे ‘10 मिनट डिलीवरी’ जैसी ब्रांडिंग को अपने विज्ञापनों, ऐप्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से हटाएंगी। इस दिशा में ब्लिंकिट ने तुरंत कदम उठाते हुए अपने ब्रांड प्लेटफॉर्म से 10-मिनट डिलीवरी क्लेम हटा दिया है। यह फैसला उन हजारों राइडर्स के लिए राहत की सांस है, जो हर दिन टाइमर के दबाव में सड़कों पर अपनी जान जोखिम में डालते हैं।
बीते कुछ दिनों से गिग वर्कर्स के मुद्दे को मुखर रूप से उठाने वाले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने इस फैसले का स्वागत किया है। गिग वर्कर्स की जमीनी सच्चाई को समझने के लिए उन्होंने सोमवार को एक डिलीवरी वर्कर के साथ पूरा दिन बिताया और उस अनुभव को सोशल मीडिया के जरिए साझा भी किया। उनके वीडियो ने राइडर्स पर पड़ने वाले मानसिक और शारीरिक दबाव को सामने लाने में अहम भूमिका निभाई।
राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “सत्यमेव जयते। साथ मिलकर हमने जीत हासिल की है। जब राइडर की जैकेट, बैग और टी-शर्ट पर ‘10 मिनट’ लिखा होता है और ग्राहक की स्क्रीन पर टाइमर चलता है, तो दबाव असली, लगातार और खतरनाक हो जाता है।” उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल डिलीवरी राइडर्स बल्कि सड़कों पर चलने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा के लिए जरूरी था।
सरकार और कंपनियों के इस कदम से यह संदेश साफ है कि तकनीक और सुविधा की रफ्तार इंसानी जान से बड़ी नहीं हो सकती। अब उम्मीद की जा रही है कि क्विक-कॉमर्स सेक्टर में काम करने वाले लाखों गिग वर्कर्स को बिना डर और दबाव के सुरक्षित माहौल में काम करने का अधिकार मिलेगा।

